रामबहादुर राय
वरिष्ठ पत्रकार
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एनडीटीवी छापा प्रकरण का जो विरोध हो रहा है, वह अनुचित नहीं है. मसलन, जो लोग यह समझते हैं कि यह सरकार प्रेस की आजादी को दबा रही है, उनको विरोध स्वरूप अपनी बात कहने का पूरा हक है. लेकिन, सीबीआइ छापों के विरोध में दिल्ली प्रेस क्लब में इकट्ठा हुए वरिष्ठ पत्रकारों के जो भाषण हुए, वे अतिरंजित हैं. अतिरंजित इसलिए कि वहां उपस्थित नरीमन साहब ने जो कुछ कहा, उससे यह लगा कि हम आपातकाल के दौर में रह रहे हों और अब नागरिक आजादी छिन गयी है, लोगों पर हमले हो रहे हैं. मेरी समझ में, जहां-जहां ऐसे हमले हो रहे हैं, उसके खिलाफ आवाज उठाने की भावना बिल्कुल सही है, लेकिन यह कहना कि आपातकाल जैसी परिस्थिति है, तो मैं इसे अनुचित समझता हूं.
सीबीआइ की साख पहले तो बहुत खराब थी, लेकिन आज उसकी छवि बदल गयी है कि वह स्वच्छंद है. सीबीआइ के पिछले तीन-चार फैसलाें को देखें, तो ऐसा लगता है कि सीबीआइ अपना काम कर रही है और बिना किसी राजनीतिक दबाव के वह मजबूत आधाराें पर कार्रवाई भी कर रही है. अगर सीबीआइ पर राजनीतिक दबाव होता, तो एलके आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी आदि पर सीबीआइ षड्यंत्र का केस नहीं चलाती. इस आधार पर मेरा मानना है कि एनडीटीवी पर सीबीआइ की कार्रवाई तथ्यों के आधार पर है.
एक अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, एनडीटीवी पर तीन तरह के मामले हैं- फेरा वायलेशन का है, मनी लॉन्ड्रिंग का है, और बैंक को नुकसान पहुंचाने का है. तीसरे मामले में सीबीआइ ने छापा डाला, जो 48 करोड़ का है. यहां कुछ बातें ध्यान में रखनेवाली हैं. एनडीटीवी पर जांच यूपीए सरकार के समय से ही चल रही है, लेकिन तब प्रणव राय अपने राजनीतिक असर का इस्तेमाल करके उसको रुकवा देते थे. इस समय जो जांच चल रही है, इसमें प्रणव राय के प्रभाव का असर नहीं पड़ रहा है, इसलिए जांच चल रही है. अब जांच चलना और सजा होना दोनों दो बातें हैं.
कई बार यहां जांच डराने के लिए भी होती है, इस बात को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता. ऐसे में अगर सरकार की एजेंसियां जांच कर रही हैं, तो क्या एनडीटीवी को डराने के लिए कर रही हैं? ये जांच क्या एनडीटीवी के जरिये प्रेस को डराने के लिए की जा रही हैं, या एनडीटीवी वास्तव में गुनहगार है? ये तीन पक्ष हैं और इन तीनों का अपना-अपना पक्ष है, लेकिन अभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता कि प्रेस को डराने के लिए एजेंसियां जांच कर रही हैं.
मीडिया में इस तरह के मामले भारत सरकार की गलत नीतियों के कारण ही आये हैं. एक तरफ अगर नीति के स्तर पर विदेशी पूंजी की इजाजत देते हैं, तो उसमें मनी लॉन्ड्रिंग भी होगी, उसमें हवाला भी होगा, और बैंक के साथ फ्रॉड भी होगा. बिजनेस इसी तरह से चलता है.
दुनिया का कोई भी देश मेरी जानकारी में नहीं है, जहां मीडिया में िवदेशी पूंजी की इजाजत दी गयी हो. इसीलिए, हम लंबे समय से इस बात को उठाते रहे हैं और इस सरकार से भी कहते रहे हैं कि जिस तरह से नेहरू के समय में पहला प्रेस आयोग बना था, मोरारजी देसाई ने दूसरा प्रेस आयोग बनाया और जब इंदिरा गांधी आयीं, तो उन्होंने दूसरे प्रेस आयोग का पुनर्गठन कर दिया, जिसकी रिपोर्ट 1982 में आयी.
साल 1982 से लेकर आज 2017 के लंबे समय में प्रेस की वस्तुस्थिति पर भारत सरकार की ओर से कोई अध्ययन नहीं हुआ है. मैं चाहता हूं कि भारत सरकार अब तीसरा प्रेस आयोग बनाये. जब दूसरा प्रेस आयोग बना था, तब केवल प्रिंट था. लेकिन, अब मीडिया का विस्तार हो गया, तो इसकी वस्तुस्थिति का अध्ययन होना चाहिए. हमारे संविधान में मीडिया को जो अधिकार है, वह नागरिक का अधिकार है.
इस अधिकार में कहीं असंतुलन हो रहा है, या इस अधिकार को कहीं छीना जा रहा है, या इस अधिकार पर कोई हमला हो रहा है, या इस अधिकार का अतिक्रमण कर रहा है, तो सरकार की यह जिम्मेवारी है कि वह हस्तक्षेप करके मीडिया को संविधान से मिले अधिकारों की रक्षा का उपाय करे. आज मीडिया के जो एकाधिकारी घराने हैं, उनके दबाव में पिछली सरकारों ने भी और इस सरकार ने भी कोई कदम नहीं उठाया है. इसलिए जरूरत इस बात की है कि मीडिया की वस्तुस्थिति का अध्ययन हो और लोगों को यह भी पता चले कि किस मीडिया में कितनी विदेशी पूंजी लगी हुई है.
नागरिकों के पास मीडिया का जो अधिकार है, वह मीडिया मालिकों का अधिकार नहीं है, बल्कि नागरिकों के प्रतिनिधि के तौर पर पत्रकारों का अधिकार है. पत्रकारों के अधिकार की रक्षा के लिए हमें आवाज उठानी चाहिए. एनडीटीवी का मामला पत्रकारों के अधिकारों से जुड़ा हुआ मामला नहीं है.
प्रेस क्लब में आये वरिष्ठ पत्रकारों ने भी पत्रकारों की आजादी की बात नहीं की, बल्कि प्रणव राय पर हमला हुआ है, इसकी रक्षा में वे खड़े हुए हैं. आज मीडिया में जो वास्तविक संकट है, वह पत्रकारों के अधिकारों का ही संकट है, इसलिए प्रेस क्लब में इस पर बात होनी चाहिए थी, न कि किसी मीडिया मालिक के अधिकार पर. (वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)
