ग्रामीण विकास की कल्पना

अक्सर अखबारों में पढ़ने को मिलता है कि दो डोभा निर्माण के नाम पर पूरे पैसे निकाले गये, लेकिन वास्तव में निर्माण एक ही पाया गया और सरकारी फाइलों में खर्च राशि दोनों की दिखायी गयी. चाहे बात तालाब निर्माण से लेकर कुआं निर्माण की हो, इनके निर्माण की राशि सरकारी फंड से आपसी मिली-भगत […]

अक्सर अखबारों में पढ़ने को मिलता है कि दो डोभा निर्माण के नाम पर पूरे पैसे निकाले गये, लेकिन वास्तव में निर्माण एक ही पाया गया और सरकारी फाइलों में खर्च राशि दोनों की दिखायी गयी. चाहे बात तालाब निर्माण से लेकर कुआं निर्माण की हो, इनके निर्माण की राशि सरकारी फंड से आपसी मिली-भगत करके फर्जी तरीके से निकाल ली जाती है.
तस्वीरों, फाइलों में ही निर्माण कार्य पाये जाते हैं. अब सवाल उठता है कि हम गांवों के विकास की कल्पना कहां तक कर सकते हैं? क्या सिर्फ सरकारी योजना बना देने से विकास की कल्पना की जा सकती है? विकास का सही आकलन करने के लिए जमीनी स्तर पर हुए कार्यो को देखना जरूरी है. क्या सरकार ग्रामीण विकास को प्राथमिकता में रखती है या फिर सारे कार्य सिर्फ कागजों में सिमट जायेंगे.
अभिषेक चन्द्र उरांव, सिसई, गुमला

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