ज्ञानपीठ जीतने के बाद वैरामुथु का दर्द छलका, बोले- अनुवाद की कमी ने तमिल साहित्य को दुनिया से दूर रखा

Tamil writer Vairamuthu : 60वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित तमिल साहित्यकार आर. वैरामुथु ने तमिल साहित्य के वैश्विक पहचान को लेकर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने अनुवाद की कमी को मुख्य कारण बताया है, जिससे कई रचनाकारों को उचित सम्मान नहीं मिल पाता.

Tamil writer Vairamuthu : नई दिल्ली में 60वां ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के बाद तमिल के प्रख्यात साहित्यकार, गीतकार और लेखक आर. वैरामुथु ने तमिल साहित्य की वैश्विक पहचान को लेकर चिंता जताई. पीटीआई न्यूज एजेंसी के मुताबिक, उन्होंने कहा कि तमिल भाषा का समृद्ध साहित्य दूसरी भारतीय भाषाओं और विदेशी भाषाओं में बहुत कम अनुवादित होता है. यही वजह है कि तमिल के कई बड़े रचनाकारों को वह पहचान नहीं मिल पाती, जिसके वे वास्तव में हकदार हैं.

चार दशक की साहित्य साधना का मिला सम्मान

ज्ञानपीठ पुरस्कार आर. वैरामुथु को उनके चार दशक से अधिक लंबे साहित्यिक जीवन और समग्र साहित्यिक योगदान के लिए प्रदान किया गया है. उन्होंने कविता, उपन्यास, निबंध और फिल्मी गीतों के माध्यम से तमिल साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है. साहित्य और सिनेमा दोनों क्षेत्रों में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.

'कल्लिक्कट्टू एथिकासम' बनी पहचान की सबसे बड़ी वजह

लेखक वैरामुथु की सबसे चर्चित कृति 'कल्लिक्कट्टू एथिकासम'(Kallikattu Ithikasam) को इस सम्मान में विशेष रूप से रेखांकित किया गया. यह महाकाव्यात्मक उपन्यास ग्रामीण जीवन, विस्थापन और मानवीय संघर्ष की मार्मिक कहानी प्रस्तुत करता है. इसी रचना के लिए उन्हें वर्ष 2003 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था. इस कृति को आधुनिक तमिल साहित्य की सबसे प्रभावशाली रचनाओं में गिना जाता है.

पहले भी उठती रही है भारतीय भाषाओं के अनुवाद की मांग

भारतीय भाषाओं के साहित्य के बेहतर अनुवाद की मांग लंबे समय से उठती रही है. साहित्यकारों का मानना है कि अनुवाद की कमी के कारण कई उत्कृष्ट कृतियां राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पाठकों तक नहीं पहुंच पातीं. तमिल साहित्यकार वैरामुथु का यह बयान उसी बहस को फिर से केंद्र में ले आया है. उनका मानना है कि यदि तमिल सहित सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य का बड़े स्तर पर अनुवाद हो, तो भारतीय साहित्य को वैश्विक मंच पर कहीं अधिक सम्मान और पहचान मिल सकती है.

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Published by: Satyendra Giri

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