Tata Chairman Dispute : देश के सबसे बड़े कारोबारी घरानों में शुमार टाटा ग्रुप के भीतर लीडरशिप और भविष्य के ढांचे को लेकर खींचतान तेज हो गई है. हाल ही में हुई टाटा संस के बोर्ड की बैठक में एन. चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए दोबारा चेयरमैन चुनने का प्रस्ताव पास किया गया.
हालांकि, यह फैसला सबकी सहमति से नहीं हुआ. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इसके खिलाफ वोट डाला और अपना विरोध दर्ज कराया. यह प्रस्ताव एक स्वतंत्र निदेशक के निर्णायक वोट (कास्टिंग वोट) के जरिए पास तो हो गया, लेकिन नोएल टाटा के विरोध ने इस फैसले की कानूनी वैधता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.
'टाटा संस को प्राइवेट रखना 100 साल पुराने मॉडल की रीढ़'
नोएल टाटा का कहना है कि टाटा संस को गैर-सूचीबद्ध (प्राइवेट) रखना सिर्फ पसंद का मामला नहीं, बल्कि पूरे टाटा मॉडल का मूल आधार है. टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की सबसे बड़ी हिस्सेदारी (करीब 66%) है और कंपनियों से मिलने वाले डिविडेंड से बड़े पैमाने पर सामाजिक और धर्मार्थ काम होते हैं.
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नोएल का तर्क है कि प्राइवेट कंपनी होने के नाते ही टाटा संस सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और एविएशन (विमानन) जैसे भारी निवेश और लंबे समय में मुनाफा देने वाले सेक्टर्स में निर्भीक होकर फैसले ले पाती है.
यदि कंपनी शेयर बाजार में लिस्ट हो गई, तो उसे हर तिमाही में वित्तीय रिटर्न चाहने वाले संस्थागत निवेशकों को जवाब देना पड़ेगा. इससे नुकसान में चल रहे कारोबार को संभालने और नए जोखिम लेने की क्षमता कमजोर होगी.
RBI का फैसला और लिस्टिंग का दबाव
टाटा संस को 'अपर-लेयर एनबीएफसी' (NBFC) की श्रेणी में रखे जाने के बाद बाजार में उसकी लिस्टिंग को लेकर चर्चाएं तेज हैं. टाटा संस ने मार्च 2024 में अपना एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की अर्जी दी थी, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने हाल ही में 11 सितंबर को खारिज कर दिया और तय नियमों का पालन करने को कहा.
नोएल टाटा का कहना है कि आरबीआई ने सीधे तौर पर तुरंत लिस्टिंग का आदेश नहीं दिया है, इसलिए कंपनी को लिस्टिंग की ओर भागने से पहले सभी कानूनी विकल्पों और नियामक से बातचीत के रास्तों को टटोलना चाहिए.
एसपी ग्रुप का ₹25,000 करोड़ का प्रस्ताव
इसी बैठक में नोएल टाटा ने शापूरजी पालोनजी (SP) ग्रुप की ओर से 25,000 करोड़ रुपये का एक प्रस्ताव भी बोर्ड के सामने रखा. इस प्रस्ताव के तहत टाटा संस को पब्लिक लिस्टिंग में धकेले बिना, शेयर बायबैक या कुछ हिस्सों को बेचकर एसपी ग्रुप को जरूरी नकदी (Liquidity) मुहैया कराने का विकल्प दिया गया है.
अब सारा दारोमदार इस बात पर निर्भर करता है कि ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर्स के अधिकारों को दरकिनार कर लिया गया यह फैसला कानूनी तौर पर कितना टिक पाता है. विश्लेषकों का मानना है कि चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल पर बोर्ड की मुहर के बावजूद यह विवाद अदालत या कानूनी समीक्षा की दहलीज तक पहुंच सकता है.
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