तमिलनाडु के महाबलीपुरम में हुई 31वीं दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में दक्षिण भारत से जुड़े कई अहम मुद्दे सामने आए. बैठक में अंतरराज्यीय जल विवाद, लोकसभा परिसीमन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, बड़ी विकास परियोजनाएं और केंद्र-राज्य के बीच बेहतर तालमेल पर चर्चा हुई.
इस दौरान जहां एक तरफ,केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की अपील की. वहीं दूसरी ओर, दक्षिणी राज्यों ने परिसीमन के बाद अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर चिंता जताई.
क्या है दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद और क्यों महत्वपूर्ण है?
- दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद का गठन राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था. इसमें आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के साथ पुडुचेरी, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप शामिल हैं.
- इस परिषद का मुख्य उद्देश्य दो या अधिक राज्यों के बीच तथा केंद्र और राज्यों के बीच साझा समस्याओं और हितों पर चर्चा करना है. यह एक सलाहकारी संस्था है, इसलिए इसके सुझाव अपने आप कानून नहीं बनते.
- परिषद में उठाए गए मुद्दों की पहले स्थायी समिति द्वारा जांच की जाती है. इसके बाद महत्वपूर्ण मामलों पर परिषद की बैठक में चर्चा होती है. स्थायी समिति परिषद की सिफारिशों पर हुई कार्रवाई की निगरानी भी करती है.
- इस प्रकार, दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद राज्यों और केंद्र के बीच सहयोग, समन्वय और समस्याओं के समाधान के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है.
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बातचीत के जरिए जल विवाद के समाधान पर जोर
बैठक में अंतरराज्यीय जल विवाद सबसे प्रमुख मुद्दों में रहा.
- केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि राज्यों का अपने हितों की रक्षा करना स्वाभाविक है, लेकिन इसका असर दूसरे राज्यों को मिलने वाले पानी पर नहीं पड़ना चाहिए.
- उन्होंने जल विवादों को जल्द सुलझाने के लिए केंद्र और संबंधित राज्यों के बीच नियमित बैठक करने पर जोर दिया.
- उन्होंने बड़े नदी तंत्रों को आपस में जोड़ने की संभावना का भी उल्लेख किया.
- ब्रह्मपुत्र, कावेरी और गोदावरी जैसी नदियों को जोड़ने को भविष्य की जल संरक्षण से जोड़ा गया. इससे जल उपलब्धता के साथ-साथ जल परिवहन के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं.
हालांकि, इसे किसी स्वीकृत परियोजना का निर्णय नहीं, बल्कि एक व्यापक विचार के रूप में देखा जाना चाहिए.
मेकेदातु, मुल्लापेरियार और कृष्णा जल विवाद
कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवादित मेकेदातु परियोजना पर भी चर्चा हुई. कर्नाटक की ओर से कहा गया कि परियोजना आगे बढ़ने पर तमिलनाडु के हितों का ध्यान रखा जाएगा. हालांकि, इसे कावेरी जल विवाद का अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता.
केरल ने मुल्लापेरियार बांध से जुड़ा मुद्दा उठाया. वहीं तेलंगाना ने कृष्णा नदी के पानी में अपने अधिकारों की सुरक्षा और सिंचाई परियोजनाओं के लिए केंद्र से सहयोग की मांग की.
इन विवादों से स्पष्ट होता है कि जल का मुद्दा केवल नदी और बांध तक सीमित नहीं है. इसका सीधा संबंध कृषि, पेयजल, उद्योग, पर्यावरण और राज्यों के विकास से है.
परिसीमन के मुद्दे पर भी चर्चा
- बैठक में लोकसभा परिसीमन भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा रहा. कर्नाटक और तमिलनाडु की ओर से मौजूदा 543 लोकसभा सीटों को अगले 25 वर्षों तक बनाए रखने की मांग की गई.
- दक्षिणी राज्यों की मुख्य चिंता यह है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा प्रदर्शन किया है. यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का बंटवारा मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर होता है, तो इन राज्यों का संसद में राजनीतिक प्रभाव कम हो सकता है.
- हालांकि, केंद्र सरकार का कहना है कि परिसीमन के बाद दक्षिणी राज्यों की सीटें कम नहीं होंगी, बल्कि बढ़ सकती हैं. इसलिए इस विषय पर अभी भी व्यापक चर्चा और सहमति की आवश्यकता है.
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विकास के दूसरे परियोजनाओं पर भी चर्चा
बैठक में कई विकास परियोजनाओं पर भी चर्चा हुई.
- आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु को जोड़ने वाले बुलेट ट्रेन कॉरिडोर और अमरावती-बेंगलुरु-चेन्नई ट्रांजिट नेटवर्क का प्रस्ताव रखा.
- आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से जुड़े परिसंपत्तियों और देनदारियों के बंटवारे के लंबित मामलों पर भी चर्चा हुई.
- इन मुद्दों से पता चलता है कि बड़े विकास कार्यों के लिए केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय जरूरी है.
राष्ट्रीय स्तर पर कितना महत्वपूर्ण है ये बैठक
- दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक केवल प्रशासनिक बैठक नहीं है. इसमें दो महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आए, संसाधनों का बंटवारा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व.
- जल विवाद राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे से जुड़े हैं, जबकि परिसीमन संसद में राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा विषय है. इसलिए इन मुद्दों का प्रभाव केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में सहकारी संघवाद की बहस से जुड़ता है.
- इस परिषद की सबसे बड़ी भूमिका राज्यों के बीच मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने की है. इसका उद्देश्य राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर समन्वय, सहयोग और संवाद स्थापित करना है. यही सहकारी संघवाद की मुख्य भावना है.
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