Mohra Power Project: सिंधु जल संधि को ठंडे बस्ते में डालने के बाद भारत ने जम्मू-कश्मीर में एक और रणनीतिक कदम उठाया है. झेलम नदी पर स्थित 120 साल पुराने मोहरा हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट को फिर से शुरू करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है. उमर अब्दुल्ला सरकार के इस फैसले को ऊर्जा और रणनीतिक दोनों ही नजरियों से बेहद अहम माना जा रहा है.
उत्तर कश्मीर के बारामुला जिले के उरी सेक्टर के बोनियार इलाके में स्थित यह प्रोजेक्ट कभी पूरे इलाके की बिजली जरूरतों का मुख्य आधार था. 1905 में शुरू हुआ यह प्लांट भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे पुराने जलविद्युत संयंत्रों में शामिल रहा है.
30 साल बाद फिर जगेगी उम्मीद
करीब 10.5 मेगावाट क्षमता वाले इस प्रोजेक्ट ने शुरुआती दौर में क्षेत्र के विकास में बड़ी भूमिका निभाई थी. लेकिन 1992 की भीषण बाढ़ के बाद यह पूरी तरह बंद हो गया था और पिछले तीन दशकों से ठप पड़ा था. अब बदलते भू-राजनीतिक हालात और बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के बीच इसे दोबारा चालू करने का फैसला लिया गया है.
बोर्ड ने दी मंजूरी, जल्द आएगा टेंडर
जम्मू-कश्मीर स्टेट पावर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (JKSPDC) के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने 9 फरवरी 2026 को हुई अपनी 97वीं बैठक में इस प्रोजेक्ट के पुनरुद्धार को मंजूरी दी. प्रोजेक्ट के लिए ट्रांजैक्शन एडवाइजर (TA) नियुक्त होगा. साथ ही रेनोवेशन, मॉडर्नाइजेशन और अपग्रेडेशन की पूरी प्रक्रिया होगी. ऑपरेशन और मेंटेनेंस के लिए नई व्यवस्था बनेगी और जल्द ही टेंडर जारी होने की संभावना है.
IIT रुड़की तैयार करेगा नया खाका
प्रोजेक्ट को आधुनिक स्वरूप देने के लिए आईआईटी रुड़की को डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) अपडेट करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. संस्थान की टीम घाटी का दौरा कर चुकी है और डिजाइन में बदलाव के सुझाव भी दिए हैं. साथ ही मौजूदा ढांचे और संपत्तियों का मूल्यांकन भी किया जा रहा है.
सिंधु संधि के बाद तेज हुआ हाइड्रो मिशन
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया है. इसके बाद जम्मू-कश्मीर में जलविद्युत परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है.
सरकार का लक्ष्य
इस प्रोजेक्ट से सरकार का लक्ष्य मौजूदा 3540 मेगावाट क्षमता को 2035 तक बढ़ाकर 11,000 मेगावाट करना है. इस लिहाज से मोहरा प्रोजेक्ट का पुनरुद्धार एक बड़ी रणनीतिक योजना का हिस्सा माना जा रहा है.
120 साल पुरानी इंजीनियरिंग का कमाल
मोहरा प्रोजेक्ट अपनी अनोखी इंजीनियरिंग के लिए भी मशहूर रहा है. 1902 में कनाडाई इंजीनियर मेजर अलियन डी लिटबनियर ने डिजाइन किया था. 10-11 किलोमीटर लंबी लकड़ी की नहर (फ्लूम) बनाई गई. पहाड़ों से पानी टर्बाइन तक पहुंचाया जाता था. यह अपने समय का पर्यावरण अनुकूल और उन्नत मॉडल है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट की मशीनरी रावलपिंडी से घोड़ा गाड़ियों के जरिए लाई गई थी.
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