मधु कांकरिया को मिलेगा श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको सम्मान, मन की बेचैनी को आवाज दी, खुशी है उसे स्वीकृति मिली

भूमंडलीकरण के बाद से किसानों की हालत खराब है. वे आत्महत्या कर रहे हैं, तो इसकी वजह सरकारी नीतियां हैं. सूखे की मार तो वे पहले भी झेल रहे थे, लेकिन अब वे बेबस हैं. मैं मराठवाड़ा गयी थी और वहां देखा किसान किस तरह जी रहे हैं. उनकी समस्याएं क्या हैं?

उर्वरक क्षेत्र की अग्रणी सहकारी संस्था इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड (इफ्को) ने वर्ष 2023 के ‘श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य’ सम्मान के लिए कथाकार मधु कांकरिया के नाम की घोषणा की है. पुरस्कार की घोषणा होने पर प्रभात खबर के साथ खास बातचीत में मधु कांकरिया ने कहा कि जब पुरस्कार की घोषणा होती है तो खुशी होती है. इस बात का संतोष होता है कि आपके लेखन को स्वीकृति मिली.

बेबस है देश का किसान

भूमंडलीकरण के बाद से किसानों की हालत खराब है. वे आत्महत्या कर रहे हैं, तो इसकी वजह सरकारी नीतियां हैं. सूखे की मार तो वे पहले भी झेल रहे थे, लेकिन अब वे बेबस हैं. मैं मराठवाड़ा गयी थी और वहां देखा किसान किस तरह जी रहे हैं. उनकी समस्याएं क्या हैं? सरकार चाहती है कि किसान खेती छोड़ दें ताकि काॅरपोरेट फाॅर्मिंग हो. किसान का नाता अपनी जमीन से टूट रहा है और वे मजदूर बन रहे हैं. स्थिति इतनी खराब है कि किसानों को मरने के बाद भी सद्‌गति नहीं मिल रही है. मैं जब वहां गयी, तो देखा सच्चाई क्या है. लेकिन यह सच्चाई कभी सामने नहीं आती. टीवी पर तमाम खबरें चलती हैं, लेकिन किसानों की समस्या पर कोई नहीं बोलता. उनकी समस्याएं कभी मुख्यधारा में नजर नहीं आतीं और ना उनपर चर्चा होती है. इन सब चीजों को देखकर मेरे मन में बहुत बेचैनी होती है और वही सारी चीजें कलम के जरिए कागजों पर उतर जाती हैं.

लेखक सच लिखने का रास्ता निकाल लेता है

आज स्थिति यह है कि हर संस्था बिक चुकी है. आप किस पर भरोसा करेंगे? इन हालात में लेखक को परेशानी होती है, आखिर वो सच कैसे लिखे. पर हम लिखते हैं, रास्ता निकालते हैं. कोई व्यंग्य लिखता है, कोई नाम नहीं लिखता पर लिखते हैं लेखक. मैं तो सीधे लिखती हूं, जिसपर कई लोगों को आपत्ति होती है. पर मेरे अंदर हालात को देखकर जो बेचैनी होती है, उसे मैं रोक नहीं पाती हूं. अब अगर उन चीजों को स्वीकृति मिलती है, तो निश्चत तौर पर अच्छा महसूस होता है.

मधु कांकरिया का जन्म कोलकाता में हुआ

मधु कांकरिया हिन्दी साहित्य की प्रतिष्ठित लेखिका हैं. इनका जन्म 23 मार्च 1957 को कोलकाता में हुआ है. मधु कांकरिया ने सात उपन्यास और 12 कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. इनकी रचनाओं में विचार और संवेदना की नवीनता तथा समाज में व्याप्त समस्याएं प्रमुखता से नजर आती हैं. इन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम° ए° की शिक्षा प्राप्त की तथा कोलकाता से ही कम्प्यूटर एप्लीकेशन में डिप्लोमा किया है. इनकी प्रमुख रचनाएं हैं -चिड़िया ऐसे मरती है, काली चील, फाइल,उसे बुद्ध ने काटा, भरी दोपहरी के अँधेरे, खुले गगन के लाल सितारे, सूखते चिनार, सलाम आखिरी, पत्ताखोर, सेज पर संस्कृत.

2011 से दिया जा रहा है सम्मान

गौरतलब है कि मूर्धन्य कथाशिल्पी श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में वर्ष 2011 में इस पुरस्कार की शुरुआत हुई थी. यह पुरस्कार प्रत्येक वर्ष ऐसे हिंदी लेखक को दिया जाता है जिसकी रचनाओं में मुख्यतः ग्रामीण व कृषि जीवन का चित्रण किया गया हो. इससे पहले यह सम्मान विद्यासागर नौटियाल, शेखर जोशी, संजीव, मिथिलेश्वर, अष्टभुजा शुक्ल, कमलाकांत त्रिपाठी, रामदेव धुरंधर, रामधारी सिंह दिवाकर, महेश कटारे, रणेंद्र, शिवमूर्ति और जयनंदन को दिया जा चुका है. मधु कांकरिया को यह सम्मान 30 सितंबर को नई दिल्ली में दिया जायेगा. उन्हें एक प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिह्न और 11 लाख रुपये का चेक प्रदान किया जाएगा.

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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