Live in Relationship: लिव इन रिलेशन में रहने से पहले जानें क्या कहता है कानून

भारतीय समाज में लिव इन पार्टनर का काॅन्सेप्ट अब चौंकाने वाला नहीं रहा है. खासकर बड़े शहरों में दो वयस्क व्यक्ति सहमति से लिव इन रिलेशनशिप बना रहे हैं और वर्षों साथ में रह भी रहे हैं. लेकिन आज भी इस संबंध को लेकर सकारात्मकता समाज में नहीं है.

आज मुंबई से एक खबर आयी है जिसमें मनोज साहनी नाम के एक 56 साल के व्यक्ति ने अपनी लिव इन पार्टनर सरस्वती वैद्य की हत्या कर दी है. इतना ही नहीं उसने अपनी 32 साल की पार्टनर के शव के 20 टुकड़े कर उसे कुत्तों को खिला दिया. कुछ ऐसा ही मामला दिल्ली के महरौली इलाके से आया था जहां श्रद्धा वालकर के लिव इन पार्टनर अमीन पूनावाला ने उसकी हत्या कर लाश के 35 टुकड़े कर दिये थे.

लिव इन रिलेशनशिप को लेकर समाज का नजरिया नकारात्मक

भारतीय समाज में लिव इन पार्टनर का काॅन्सेप्ट अब चौंकाने वाला नहीं रहा है. खासकर बड़े शहरों में दो वयस्क व्यक्ति सहमति से लिव इन रिलेशनशिप बना रहे हैं और वर्षों साथ में रह भी रहे हैं. लेकिन आज भी इस संबंध को लेकर सकारात्मकता समाज में नहीं है. परेशानी तब और बढ़ जाती है जब लिव इन पार्टनर अधिकार जताने लगता है या मांगने लगता है. यह स्थिति कई बार आपराधिक घटनाओं के लिए जिम्मेदार होती है. इन हालात में स्त्री हो या पुरुष दोनों के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि लिव इन पार्टनर के अधिकार क्या हैं और कौन लोग लिव इन पार्टनर हो सकते हैं.

कोई विवाहित व्यक्ति लिव इन रिलेशन में नहीं रह सकता

1. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार भारत में लिव इन रिलेशनशिप अब अवैध नहीं है.

2. दो बालिग लोग यानी दो 18 साल से अधिक के व्यक्ति ही लिव इन रिलेशन में रह सकते हैं.

3. लिव इन रिलेशनशिप में रहने के लिए दोनों स्त्री और पुरुष का अविवाहित होना जरूरी है.

4. अगर कोई विवाहित व्यक्ति लिव इन में रहता है, तो कानूनन यह गलत होगा.

5. पति या पत्नी से तलाक के बाद ही कोई विवाहित व्यक्ति लिव इन में रह सकता है.

6. लिव इन में रहने वाले व्यक्ति बच्चे तो पैदा कर सकते हैं, लेकिन वे बच्चे को गोद नहीं ले सकते

7. लिव इन से पैदा होने वाले बच्चों को सभी कानूनी अधिकार प्राप्त होते हैं.

गुजारा भत्ता के लिए शारीरिक संबंध जरूरी 

8. अगर कोई महिला कुछ दिन किसी पुरुष के साथ रहकर अलग हो जाती है और गुजारा भत्ता की मांग करती है तो यह गलत होगा. गुजारा भत्ता के लिए लिव इन रिलेशन वर्षों का होना चाहिए. उन्हें एक साथ एक छत के नीचे रहना और शारीरिक संबंध बनाना भी जरूरी है. पार्टनर की मौत के बाद गुजारा भत्ता नहीें मिलेगा.

9. अगर आपको अपने लिव इन रिश्ते पर शंका हो और आपको लगता हो कि आपके रिश्ते पर सवाल उठ सकते हैं तो इन दस्तावेज को साथ रखें. रेंट एग्रीमेंट , ज्वाइंट बैंक एकाउंट, पार्टनरशिप बिजनेस अथवा बायोलाॅजिकल चाइल्ड की डिटेल ताकि अगर आपको लिव इन साबित करने की नौबत आये तो आप वो कर पायें. इसलिए जो भी जरूरी दस्तावेज हों उन्हें अपने पास रखें.

10. हाई कोर्ट के आदेश से यह साबित हो चुका है कि अगर किसी लिव इन पार्टनर्स को जान का खतरा अपने परिजनों या किसी अन्य से हो तो वे पुलिस संरक्षण मांग सकते हैं.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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