दिल्ली हाई कोर्ट ने रेल मंत्रालय की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने NHRC के मुआवजे वाले आदेश को चुनौती दी थी. न्यायमूर्ति अमित बंसल ने कहा कि यात्रियों को सुरक्षित माहौल देना रेलवे की जिम्मेदारी है. कोर्ट ने माना कि ट्रेन में हुआ सामूहिक दुष्कर्म एक गंभीर और अवांछित घटना है. इसलिए रेलवे पीड़िता को मुआवजा देने से बच नहीं सकता.
न्यायमूर्ति अमित बंसल ने कहा कि NHRC का मुआवजा देने का आदेश पूरी तरह सही और कानूनी है. इसमें कोई मनमानी या अवैधता नहीं है. उन्होंने कहा कि आयोग ने मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन की शिकार महिला को तुरंत आर्थिक सहायता देने की सिफारिश करके अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल किया है.
पीड़िता वैध टिकट लेकर ट्रेन में यात्रा कर रही थी
29 जुलाई के अपने आदेश में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि पीड़िता वैध टिकट लेकर ट्रेन में यात्रा कर रही थी. ऐसे में ट्रेन के अंदर यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना रेलवे की जिम्मेदारी थी. इसलिए इस मामले में रेलवे अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता.
अदालत ने कहा, ''चूंकि यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना ट्रेन के एक डिब्बे के भीतर हुई, इसलिए यह रेलवे अधिनियम की धारा 123(ग) के तहत 'अवांछित घटना' की परिभाषा में आएगी और रेलवे अधिनियम की धारा 124ए के तहत रेलवे मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी होगा.'' अदालत ने कहा, ''याचिका में कोई दम नहीं है, इसलिए इसे खारिज किया जाता है.''
हाई कोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि मामले के लंबित रहने के दौरान रेलवे की ओर से जमा कराई गई मुआवजा राशि, उस पर अर्जित ब्याज सहित पीड़िता को जारी की जाए. अगस्त 2012 में बिहार के लखीसराय रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म संख्या-पांच पर खड़ी एक यात्री ट्रेन के डिब्बे में महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया था.
पीड़िता के पिता ने की थी शिकायत
पीड़िता के पिता की शिकायत पर NHRC ने अप्रैल 2014 में रेलवे बोर्ड को महिला को 3 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था. रेलवे ने यह कहते हुए फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग की कि मुआवजा तय करने का अधिकार केवल रेलवे दावा अधिकरण के पास है. लेकिन NHRC ने यह दलील नहीं मानी और अपने मुआवजे वाले आदेश को बरकरार रखा.
