केरल में यूडीएफ ने लेफ्ट के गढ़ों में सेंध लगाकर जीत हासिल की

केरल विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं. कांग्रेस 63 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी है. यूडीएफ गठबंधन को भी साफ बहुमत मिल गया है, जिससे सरकार बनाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है. यूडीएफ की जीत पर पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार प्रथापन केंद्रथिल का लेख.

केरल विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं. कांग्रेस 63 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी है. यूडीएफ गठबंधन को भी साफ बहुमत मिल गया है, जिससे सरकार बनाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है. यूडीएफ की जीत पर पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार प्रथापन केंद्रथिल का लेख.

विधानसभा चुनाव के परिणाम केरल की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हुए हैं. माकपा के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) के दस वर्षों के शासन के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने भारी बहुमत के साथ जीत दर्ज की है. भाजपा ने भी राज्य में वापसी दर्ज की, और नेमम, चथन्नूर और कझाकूट्टम जैसे तीन निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल की.

यूडीएफ ने सभी क्षेत्रों में बढ़त बनाई, पारंपरिक एलडीएफ के गढ़ों में सेंध लगायी और मध्य व उत्तरी केरल में अपने वोट आधार को मजबूत किया. इस चुनाव का एक प्रमुख निष्कर्ष मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की ‘कैप्टन’ वाली छवि का टूटना है. एलडीएफ के अधिकांश मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा. पिनराई विजयन का मजबूत गढ़ धर्मदम भी डगमगाता दिखा. कन्नूर जैसे माकपा के पारंपरिक गढ़ में भी दरार दिखाई पड़ी, जो पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष को दर्शाती हैं. यूडीएफ की जीत का सबसे महत्वपूर्ण कारण उसके पारंपरिक आधार-ईसाई और मुस्लिम समुदाय-की वापसी करना रहा.

वर्ष 2026 से पहले एलडीएफ ने इन समुदायों को आकर्षित करने के लिए काफी प्रयास किये, पर यह रणनीति उलटी पड़ गयी. खासकर ईसाई समुदाय, जो पहले एलडीएफ के साथ था, बड़ी संख्या में यूडीएफ की ओर लौट आया. मध्य केरल में यूडीएफ ने ईसाई वोटों का बड़ा हिस्सा वापस हासिल किया. सबरीमाला मंदिर से जुड़े कथित सोना चोरी/प्लेटिंग विवाद ने भी खासकर हिंदू मतदाताओं को प्रभावित किया. स्वास्थ्य क्षेत्र में गिरावट, मानव-वन्यजीव संघर्ष और महंगाई जैसे मुद्दों ने भी एलडीएफ की लोकप्रियता घटाई. भाजपा ने तीन सीटें जीतकर वोट काटने वाली पार्टी की छवि से आगे बढ़कर नयी पहचान बनायी.

एलडीएफ की सबसे बड़ी ताकत उसकी मजबूत कल्याणकारी योजनाएं रही हैं. यूडीएफ ने इन्हें और बेहतर बनाने का वादा किया. यूडीएफ के सामने कई चुनौतियां हैं. सबसे पहले, विभिन्न गुटों के बीच सहमति से नया मुख्यमंत्री चुनना होगा. फिर खाली खजाने के बीच अपने वादे पूरा करना बड़ी परीक्षा होगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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Published by: Amitabh Kumar

अमिताभ कुमार झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले हैं और पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. डिजिटल न्यूज में अच्छी पकड़ है और तेजी के साथ सटीक व भरोसेमंद खबरें लिखने के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में अमिताभ प्रभात खबर डिजिटल में नेशनल और वर्ल्ड न्यूज पर फोकस करते हैं और तथ्यों पर आधारित खबरों को प्राथमिकता देते हैं. हरे-भरे झारखंड की मिट्टी से जुड़े अमिताभ ने अपनी शुरुआती पढ़ाई जिला स्कूल रांची से पूरी की और फिर Ranchi University से ग्रेजुएशन के साथ पत्रकारिता की पढ़ाई की. पढ़ाई के दौरान ही साल 2011 में रांची में आयोजित नेशनल गेम को कवर करने का मौका मिला, जिसने पत्रकारिता के प्रति जुनून को और मजबूत किया.1 अप्रैल 2011 से प्रभात खबर से जुड़े और शुरुआत से ही डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय रहे. खबरों को आसान, रोचक और आम लोगों की भाषा में पेश करना इनकी खासियत है. डिजिटल के साथ-साथ प्रिंट के लिए भी कई अहम रिपोर्ट कीं. खासकर ‘पंचायतनामा’ के लिए गांवों में जाकर की गई ग्रामीण रिपोर्टिंग करियर का यादगार अनुभव है. प्रभात खबर से जुड़ने के बाद कई बड़े चुनाव कवर करने का अनुभव मिला. 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ झारखंड विधानसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) की भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की है. चुनावी माहौल, जनता के मुद्दे और राजनीतिक हलचल को करीब से समझना रिपोर्टिंग की खास पहचान रही है.

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