Nepal Flood : नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र की सीमा से लगे गांव बाढ़ में बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. शुक्रवार तक नेपाल में मरने वालों की आधिकारिक संख्या बढ़कर 550 के पार हो गई, जबकि चीन ने सिर्फ 5 लोगों की मौत की पुष्टि की है. यह अंतर इसलिए भी चौंकाने वाला है, क्योंकि चीन की ओर ग्यिरोंग सीमा क्षेत्र के आसपास कई हजार लोग रहते हैं. चीन के संवेदनशील माने जाने वाले तिब्बत क्षेत्र में सूचनाओं के प्रवाह पर कड़े नियंत्रण के कारण वहां हुई तबाही की पूरी जानकारी लोगों तक पहुंचने में मुश्किल आ रही है.
क्या कुछ छिपाने की कोशिश कर रहा है चीन?
The Guardian की एक रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल में पत्रकार आपदा प्रभावित इलाकों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. वे बाढ़ से बचे लोगों और राहत-बचाव कार्य में जुटे कर्मियों से बात कर रहे हैं. गांव के लोग भी बता रहे हैं कि बाढ़ ने किस तरह अचानक उनके घरों और आसपास के इलाकों को तबाह कर दिया. हालांकि, बाढ़ आने की सटीक वजह का वैज्ञानिक अभी अध्ययन कर रहे हैं.
वहीं, चीन में सरकारी मीडिया ने बाढ़ पर कई रिपोर्ट प्रसारित कीं और अपने पत्रकारों को प्रभावित क्षेत्र में भेजा. लेकिन इन रिपोर्टों में तबाही के स्तर से ज्यादा राहत और बचाव कार्यों पर जोर दिया गया. तिब्बत के एक राहत केंद्र से जारी रिपोर्ट में पत्रकार ने अपने पीछे बैठे लोगों से भी बातचीत नहीं की. इससे चीन में बाढ़ की वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
विदेशी पत्रकारों के लिए तिब्बत की यात्रा आसान नहीं
तिब्बत 1950 के दशक से चीन के नियंत्रण में है और इसे चीन का बेहद संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है. यहां अधिक स्वायत्तता और धार्मिक आजादी की मांग को लेकर समय-समय पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जिन पर चीनी अधिकारियों ने सख्ती की है. विदेशी पत्रकारों के लिए तिब्बत की यात्रा आसान नहीं है. उन्हें आमतौर पर सरकार की निगरानी में तय कार्यक्रमों के तहत ही वहां जाने की अनुमति मिलती है. कई तिब्बतियों के पास पासपोर्ट नहीं होने की बात भी कही जाती है, जिससे उनका बाहरी दुनिया से संपर्क सीमित रहता है. पत्रकारों से बात करने पर लोगों के खिलाफ कार्रवाई का डर भी बताया जाता है. मानवाधिकार संगठन लंबे समय से चीन की तिब्बत नीति की आलोचना करते रहे हैं. उनका कहना है कि तिब्बती भाषा और संस्कृति पर दबाव बढ़ रहा है.
तिब्बत में सूचनाओं पर कड़ा नियंत्रण
तिब्बत में सूचनाओं पर कड़े नियंत्रण के कारण यह पता लगाना मुश्किल हो रहा है कि अचानक आई बाढ़ से सीमा के चीनी हिस्से में कितनी तबाही हुई है. लंदन के SOAS यूनिवर्सिटी के चाइना इंस्टीट्यूट के निदेशक स्टीव त्सांग के अनुसार, तिब्बत से जुड़ी हर जानकारी को राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से देखा जाता है. उनका कहना है कि वहां ऐसी कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती, जिसे ऊपर के स्तर से मंजूरी न मिली हो. यही वजह है कि तिब्बत में बाढ़ से हुए नुकसान की स्वतंत्र और सही तस्वीर सामने आने में मुश्किल हो रही है.
चीन का भरोसा हालात को नियंत्रित रखने पर ज्यादा
चीन की आपातकालीन सेवाएं (इसमें पीपुल्स लिबरेशन आर्मी भी शामिल है) नेपाल की तुलना में काफी बेहतर संसाधनों से लैस हैं. बाढ़ प्रभावित पहाड़ी इलाकों में अभी भी हालात सुरक्षित नहीं हैं और वहां राहत-बचाव के लिए विशेष विशेषज्ञता की जरूरत है. चीन ने सैकड़ों राहतकर्मियों को भेजा है, लेकिन वे क्या काम कर रहे हैं, इसकी ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई है. विशेषज्ञ स्टीव त्सांग का कहना है कि चीन ने यहां अपनी क्षमता दिखाने का मौका गंवा दिया. उनके मुताबिक, चीन का भरोसा लोगों को जानकारी देने के बजाय हालात को नियंत्रित रखने पर ज्यादा है.
राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बैठक की
सरकारी मीडिया के मुताबिक, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने शुक्रवार को एक बैठक की और राहत-बचाव कार्यों की समीक्षा की. उन्होंने अधिकारियों को चीन और दूसरे देशों के लापता लोगों को खोजने के लिए पूरी कोशिश करने का निर्देश दिया. इसके अलावा, शी जिनपिंग ने प्रधानमंत्री ली छ्यांग को बाढ़ प्रभावित इलाके का दौरा करने के लिए भेजा. सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, ली छ्यांग ने कहा कि शी जिनपिंग आपदा प्रभावित लोगों की स्थिति को लेकर बेहद चिंतित हैं.
