महाराष्ट्र में इलाज के दौरान डॉक्टर की मौत, न्याय की आस टूटने के बाद हाथ पर लिखा सुसाइड नोट

महाराष्ट्र के सतारा में एक युवा डॉक्टर की मौत हो गई. काम के दौरान राजनीतिक दबाव और उत्पीड़न के आरोपों ने सबको झकझोर दिया है. उन्होंने अपने हाथ पर सुसाइड नोट लिखकर अपनी व्यथा जताई थी.जानिए इस दुखद घटना के पीछे की पूरी कहानी.

महाराष्ट्र के सतारा जिले से आई एक बेहद दुखद घटना ने देश भर में सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली, डॉक्टरों पर बन रहे अनावश्यक दबाव और कार्यस्थल के माहौल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. डॉ राजेंद्र रुपनावर सोलापुर जिले के मांडवे गांव के एक साधारण परिवार से थे. उन्होंने अपनी मेहनत और परिवार के सहयोग से मुंबई के प्रतिष्ठित 'ग्रांट मेडिकल कॉलेज' से MBBS की डिग्री हासिल की थी. हाल ही में उन्होंने अपने सारे कर्ज चुकाए थे और जीवन में स्थिरता की ओर बढ़ रहे थे. वह पिछले डेढ़ साल से सतारा के फलटण सब-डिस्ट्रिक्ट (उप-जिला) अस्पताल में बतौर कॉन्ट्रैक्ट मेडिकल ऑफिसर सेवा दे रहे थे.

घटनाक्रम और आत्महत्या का प्रयास

27 अगस्त को डॉ राजेंद्र ने मुंबई में कथित तौर पर आत्महत्या की कोशिश की. इसके तुरंत बाद उन्हें गंभीर हालत में मुंबई के सायन अस्पताल में भर्ती कराया गया. गर्दन में आई गंभीर चोटों और इलाज के दौरान पैदा हुई जटिलताओं के बीच उन्हें कार्डियक अरेस्ट (दिल का दौरा) आया और 31 अगस्त को उन्होंने अंतिम सांस ली. सायन अस्पताल प्रशासन का कहना है कि मौत का सटीक चिकित्सकीय कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद स्पष्ट होगा.

राजनीतिक दबाव, उत्पीड़न और हथेली पर लिखा 'सुसाइड नोट'

डॉ राजेंद्र की मौत के पीछे काम के दौरान मिल रही मानसिक प्रताड़ना और राजनीतिक दबाव को मुख्य वजह माना जा रहा है-

  • राजनीतिक दबाव का आरोप: कथित तौर पर एक राजनीतिक दल से जुड़े लोग उन पर एक व्यक्ति के लिए गलत तरीके से 'बंदूक लाइसेंस का मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट' जारी करने का अनुचित दबाव बना रहे थे.
  • हथेली पर सुसाइड नोट: राजेंद्र ने 29 जुलाई को अपनी बाईं हथेली पर सुसाइड नोट लिखकर उसकी फोटो अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर लगाई थी. उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी हताशा और अपमानित महसूस करने का जिक्र किया था. उनकी पोस्ट्स से यह साफ झलक रहा था कि वे जिस तरह के भारी दबाव और बदसलूकी का सामना कर रहे थे, उससे वे बेहद परेशान थे. उन्होंने इंस्टाग्राम रील और अन्य सोशल मीडिया पोस्ट्स के जरिए भी अपने उत्पीड़न का दुखड़ा रोया था.
  • मदद की गुहार: ऑल इंडिया मेडिकल स्टूडेंट्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय समन्वयक डॉ अपूर्व दलवी और राजेंद्र के करीबी दोस्त डॉ अमोल बानसोडे के मुताबिक, राजेंद्र ने काम के माहौल और अनुचित दबाव को लेकर कई बार अपनी परेशानी साझा की थी. राजेंद्र पुणे आने के बजाय व्यवस्था से इंसाफ की उम्मीद में वहीं टिके रहे.
  • अधिकारियों से नहीं हो सकी मुलाकात: अपनी शिकायत और दर्द वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए राजेंद्र मुंबई भी गए थे, लेकिन आरोप है कि अधिकारियों से उनकी मुलाकात नहीं हो पाई, जिसके बाद उन्होंने यह आत्मघाती कदम उठाया.
  • ऐसे ही मामलों से जूझ चुके अन्य डॉक्टर: डॉ राजेंद्र अकेले नहीं हैं जिन्हें ऐसे मुश्किलों का सामना करना पड़ा हो. देश के कई हिस्सों में डॉक्टरों को राजनीतिक दबाव, काम के बोझ और अव्यवस्था के चलते उत्पीड़न झेलना पड़ा है. कई डॉक्टरों ने व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए आवाज भी उठाई है. उदाहरण के लिए, [किसी अन्य डॉक्टर का नाम, जिसने इसी तरह की चुनौतियों का सामना किया हो या व्यवस्था में सुधार के लिए काम किया हो] ने भी अपने कार्यकाल के दौरान ऐसी ही कुछ समस्याओं का अनुभव किया था. इससे पता चलता है कि डॉ राजेंद्र की स्थिति कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद एक बड़ी समस्या का हिस्सा है.

कार्रवाई और पुराने मामलों का दोबारा उभरना

डॉ राजेंद्र की मौत के बाद अस्पताल प्रशासन और शासन स्तर पर तुरंत कुछ कड़े कदम उठाए गए हैं, साथ ही पुराने मामले भी गरमा गए हैं.

फलटण सब-डिस्ट्रिक्ट अस्पताल की मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ लीला मडाने को डॉ राजेंद्र की मौत के दिन (31 अगस्त) ही निलंबित कर दिया गया. निलंबन पत्र में जूनियर डॉक्टरों के साथ असंवेदनशील व्यवहार, कठोर संवाद और अस्पताल प्रशासन में नियंत्रण की कमी का जिक्र है. इसी फलटण सब-डिस्ट्रिक्ट अस्पताल में वर्ष 2025 में भी एक महिला डॉक्टर ने आत्महत्या की थी. उस समय भी कार्यस्थल पर उत्पीड़न और अधिकारियों के दबाव के आरोप लगे थे. राजेंद्र की मौत के बाद इस पुराने मामले की भी फिर से निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है.

डॉक्टर संगठनों की मांग

महाराष्ट्र एसोसिएशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स (MARD) के अध्यक्ष डॉ अथर्व शिंदे सहित कई चिकित्सा संगठनों ने इस घटना की तत्काल, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है. संगठनों का कहना है कि डॉक्टरों को काम करने के लिए एक सुरक्षित, सम्मानजनक और तनावमुक्त माहौल मिलना चाहिए. उन्होंने डॉक्टरों के मानसिक उत्पीड़न को रोकने के लिए सख्त कानून और ठोस संस्थागत तंत्र विकसित करने पर जोर दिया है.

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By सत्येन्द्र गिरि

सत्येन्द्र गिरि प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. यहां वे मुख्य रूप से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों से जुड़ी खबरों का लेखन करते हैं. सरल, तथ्यात्मक और पाठक-केंद्रित लेखन उनकी प्रमुख पहचान है. उन्होंने एशिया के प्रतिष्ठित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), भोपाल से मास्टर ऑफ आर्ट्स इन मास कम्युनिकेशन (बैच 2023–25) की डिग्री प्राप्त की है.

पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान उन्होंने समाचार लेखन, डिजिटल मीडिया, रिपोर्टिंग और समसामयिक विषयों की गहन समझ विकसित की. पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके पास एक वर्ष का पेशेवर अनुभव है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अमर उजाला के गोरखपुर एडिशन से की, जहां समाचार लेखन और रिपोर्टिंग की बारीकियों को नजदीक से सीखने और समझने का अवसर मिला. इसके बाद उन्होंने डिजिटल पत्रकारिता में कदम रखते हुए प्रभात खबर डिजिटल से जुड़कर देश-विदेश की महत्वपूर्ण खबरों को पाठकों तक पहुंचाने का कार्य शुरू किया.

सत्येन्द्र की विशेष रुचि इतिहास, अंतरराष्ट्रीय संबंध, राजनीति, कूटनीति और समसामयिक घटनाक्रम से जुड़े विषयों में है. वे जटिल और गंभीर मुद्दों को भी सरल, संतुलित और विश्वसनीय तरीके से प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं. राष्ट्रीय और वैश्विक घटनाओं पर उनकी गहरी नजर रहती है तथा वे तथ्यपरक और निष्पक्ष पत्रकारिता को अपनी कार्यशैली का आधार मानते हैं. वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के निवासी हैं.

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