मस्ती के लिए जानवरों को नहीं मारा, भारत के आखिरी चीतों का शिकार मामले में अंबिका सिंह ने दिया ये जवाब

देश के आखिरी तीन चीतों के शिकार के आरोप को लेकर कांग्रेस विधायक और राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव की पोती अंबिका सिंह ने कहा कि जंगली जानवरों का शिकार हमेशा मनोरंजन के लिए नहीं किया गया. शिकार खेलने या मस्ती के लिए शाही परिवार ने कभी किसी जानवर को नहीं मारा.

70 साल विलुप्त रहने के बाद एक बार फिर भारत की धरती पर चीतों का आगमन हुआ है. मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में पीएम मोदी ने 8 चीतों को पीएम मोदी ने छोड़ा है.इसी कड़ी में इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अंतिम तीन चीतों का शिकार 1947 में छत्तीसगढ़ के कोरिया रियासत के राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव ने किया था. हालांकि इस बारे में उनकी पोटी और कांग्रेस विधायक अंबिका सिंह देव ने कहा है कि उनके दादा ने कभी मौज-मस्ती के लिए चीतों का शिकार नहीं किया.

बता दें, अंबिका के जन्म से काफी पहले ही उनके दादा का निधन हो गया था. लेकिन बचपन से ही अंबिका अपने दादा की कई कहानियां सुनी थी, जिसमें उनके शिकार से संबंधित भी कई किस्से थे. अंबिका ने इसी कड़ी में कहा कि 1940 में जब उनके दादा राज्य से दूर गये थे उसी दौरान एक आदमखोर बाघ ने ग्रामीण क्षेत्र में आतंक मचा दिया था. अंबिका ने बताया की तब उनके पिता ने उस आदमखोर बाघ की शिकार किया था. अंबिका ने कहा कि जंगली जानवरों का शिकार हमेशा मनोरंजन के लिए नहीं किया गया.

अंबिका ने कहा कि शिकार खेलने या मस्ती के लिए शाही परिवार ने कभी किसी जानवर को नहीं मारा. उन्होंने कहा कि शाही परिवार ने केवल आदमखोर जानवरों का शिकार किया है. शिकार के समय उनके साथ ब्रिटिश अधिकारी भी होते थे. अंबिका ने कहा कि जरा कल्पना कीजिए उस जमाने में घने जंगल क्षेत्रों में इतने सारे जंगली जानवरों के साथ जीवित रहना कितना मुश्किल होता होगा. उन्होंने कहा कि शोक के लिए कभी किसी जानवर को नहीं मारा गया.

वहीं, अंबिका ने कहा कि उनके दादा ने 1920 के दशक में दूर-दराज के इलाकों में टेलीफोन लाइनें लगाई थी, ताकि गांव और दूर दराज में रहने वाले लोग सरकारी अधिकारियों को जानवरों के हमलों की सूचना दे सकें. उन्होंने कहा कि हमारे इलाके में कई बिहड़ हैं. उस समय तो जंगल और घना था. ऐसे में उनके दादा ने उन क्षेत्रों में टेलीफोन बूथ स्थापित किए थे जहां आज मोबाइल का भी सिग्नल नहीं आता.

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Author: Pritish Sahay

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