अमृतसर के रहने वाले 55 वर्षीय सीताराम बुधवार, 2 सितंबर को जींद के मनोहरपुर गांव पहुंचे. वह गांव के सरकारी स्कूल में अपने स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र (एसएलसी) लेने आए थे. सीताराम ने बताया कि पंजाब में चल रहे मतदाता सूची के एसआईआर सत्यापन के लिए यह प्रमाणपत्र अधिकारियों के पास जमा करना जरूरी है. इसी वजह से वह स्कूल पहुंचे.
सहायक निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (एईआरओ) रमेश कुमार ने बताया कि जब सीताराम वहां पहुंचे, तब वह स्कूल में ही मौजूद थे. रमेश ने कहा, ‘‘सीताराम ने हमें बताया कि उन्होंने इस स्कूल से 10वीं कक्षा तक पढ़ाई की थी, लेकिन परीक्षा में सफल नहीं हो पाए थे. इसलिए उन्हें स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र चाहिए था, ताकि वह इसे पंजाब के अधिकारियों के पास जमा कर सकें.’’
ये भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट ने टीएमसी से पूछा- SIR में नाम कटने के आधार पर बंगाल में फिर से चुनाव का दे सकते हैं आदेश?
भाई एक-दूसरे को देखकर रो पड़े
इसके बाद रमेश ने बूथ स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) कृष्ण कुमार को (जो उसी गांव के रहने वाले हैं) सीताराम के गांव और परिवार के बारे में जानकारी जुटाने के लिए कहा. सीताराम ने बीएलओ को बताया कि वह मनोहरपुर गांव के रहने वाले हैं और उन्होंने अपने भाई का नाम दलवीर बताया. संयोग से बीएलओ, दलवीर (60) को व्यक्तिगत रूप से जानते थे और उन्होंने उन्हें फोन किया. बातचीत के दौरान दलवीर ने अधिकारी को बताया कि सीताराम उनके बिछड़े हुए भाई हैं. दलवीर ने कहा कि वह उनसे मिलने के लिए तुरंत स्कूल पहुंच रहे हैं.
रमेश ने बताया कि दलवीर के स्कूल पहुंचने और सीताराम को देखने के बाद दोनों भाई एक-दूसरे को देखकर रो पड़े और गले लग गए. उन्होंने कहा, ‘‘कमरे में मौजूद हर व्यक्ति भावुक हो गया.’’
35 साल पहले परिवार ने इलाज के लिए भर्ती कराया था उपचार केंद्र में
सीताराम ने निर्वाचन अधिकारियों को बताया कि करीब 35 साल पहले उनके परिवार ने उन्हें पोलियो के इलाज के लिए पंजाब के संगरूर स्थित एक उपचार केंद्र में भर्ती कराया था. एक महीने बाद जब परिवार के लोग उनका हाल जानने वहां पहुंचे तो केंद्र के कर्मचारियों ने उन्हें बताया कि वह वहां से जा चुके हैं. इसके बाद परिवार ने सीताराम की तलाश शुरू कर दी. कई साल बीत गए, लेकिन उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. काफी प्रयासों के बाद भी जब परिवार उन्हें ढूंढ नहीं पाया तो उन्होंने सीताराम के मिलने की उम्मीद छोड़ दी.
सीताराम ने बताया कि वह अपनी शारीरिक स्थिति के कारण परिवार पर बोझ नहीं बनना चाहते थे, इसलिए उपचार केंद्र छोड़ दिया था. सीताराम ने बताया कि पंजाब में रहने के दौरान उन्होंने एक प्राइवेट स्कूल में सहायक के रूप में काम किया और बाद में उन्हें स्थायी नौकरी मिल गई.
