Agriculture: देशी पशुधन पर्यावरण संतुलन के साथ किसानों के समृद्धि की है कुंजी

जानवरों को बचाने से सिर्फ बायोडायवर्सिटी की रक्षा ही नहीं हो रही बल्कि गांवों की रोजी-रोटी को भी मजबूती मिलती है. इससे सतत खेती के भविष्य को सुरक्षित करने के साथ पर्यावरण संतुलन बनाने में भी मदद मिलती है.

By Vinay Tiwari | January 14, 2026 7:17 PM

Agriculture: जानवरों के इकोलॉजिकल महत्व और देसी जानवरों की नस्लों को बचाने के लिए मिलकर काम करना होगा. जानवरों के साथ भारत का रिश्ता सिर्फ आर्थिक या न्यूट्रिशन से जुड़ा नहीं है, बल्कि असल में इकोलॉजिकल है. यह बैलेंस का रिश्ता है. इस बैलेंस में किसी भी तरह की गड़बड़ी का सीधा असर पर्यावरण और फिर धरती की सेहत पर पड़ता है. ऐसे में देसी नस्लों को बचाना जरूरी हो गया है. 

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) में पशु नस्ल पंजीकरण प्रमाणपत्र एवं नस्ल संरक्षण पुरस्कार वितरण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि जानवरों को बचाने से सिर्फ बायोडायवर्सिटी की रक्षा ही नहीं हो रही बल्कि गांवों की रोजी-रोटी को भी मजबूती मिलती है. इससे सतत खेती के भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है. देसी जानवरों की नस्लों को बचाने के लिए वर्ष 2019 में शुरू की गयी राष्ट्रीय मिशन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देसी मवेशी, भैंस, मुर्गी और छोटे जुगाली करने वाले जानवर हमारी खेती की इकॉनमी की रीढ़ हैं.

उनका विकास सीधे किसानों की खुशहाली, मजबूती और आय सुरक्षा से जुड़ा है. इस मिशन को पॉलिसी और कॉन्फ्रेंस से आगे बढ़कर एक जन आंदोलन बनना चाहिए. इसे गांवों, खेतों और किसान परिवारों तक पहुंचना चाहिए और एक सच्चा जन आंदोलन बन सके. उन्होंने इस अभियान में योगदान देने वालों को पहचानने की अहमियत पर भी जोर देते हुए कहा कि पहचान मिलने से हिस्सा लेने की प्रेरणा मिलती है. ज़िंदगी, प्रकृति एवं हमारे साझा भविष्य की रक्षा करने वालों का काम देखा, सुना और मनाया जाना चाहिए.


देशी पशुओं के नस्ल में कमी आना चिंता का विषय


समय के साथ देसी नस्ल के जानवरों की संख्या में कमी आयी है. इस कमी को दूर करने के लिए सरकार की ओर से कई कदम उठाए गए. वर्ष 2008 में 242 जानवरों की नस्लें पंजीकृत की गयी. वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सभी देसी जानवरों की नस्लों का 100 फीसदी पंजीकरण का लक्ष्य रखा गया है. विशेषज्ञों ने कहा कि देखा जा रहा है कि आर्थिक कारणों से भैंसों की तुलना में अन्य मवेशियों की संख्या में कमी आयी है. पर्यावरण संतुलन और सतत विकास के लिए देसी नस्ल के जानवरों का होना बेहद आवश्यक है. 


कार्यक्रम के दौरान नयी पहचाने गए जानवरों तथा पोल्ट्री नस्लों को रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट दिया गया. किसानों, ब्रीडर्स एवं संस्थाओं को उनके शानदार योगदान के लिए ब्रीड कंजर्वेशन अवार्ड दिया गया. स्वदेशी पशु नस्लों के संरक्षण में उनके उत्कृष्ट योगदान को पहचानते हुए वर्ष 2025 के लिए व्यक्तियों और संस्थाओं को नस्ल संरक्षण पुरस्कार से सम्मानित किया. व्यक्तिगत श्रेणी में जीतुल बुरागोहेन को लुइट भैंस के संरक्षण  के लिए पहला, कुडाला राम दास को पुंगनूर मवेशियों के संरक्षण के लिए दूसरा और नस्ल संरक्षण में सराहनीय काम के लिए तिरुपति और रामचंद्रन काहनार को सांत्वना पुरस्कार दिया गया. 

ReplyForwardShare in chatNew