रेयाज उल हक
भारत में आदिवासी समाज और वैश्विक खनन उद्योग पर बात करते हुए फेलिक्स जॉन पैडल को 35 साल पहले की वह शाम याद आनी थी, जब उनके एक दोस्त अमिताभ घोष ने सलाह दी थी कि गंभीरता से समाजशास्त्र का अध्ययन करना है तो दिल्ली विश्वविद्यालय जाना चाहिए. उनकी क्लास में पढ़ने वाले अमिताभ घोष को आगे चल कर सी ऑफ पॉपीज और द हंगरी टाइड जैसे उपन्यासों का लेखक बनना था.
और फेलिक्स पैडल को यह स्थापित करना था कि किस तरह विकास के बहाने चल रहे खनन उद्योग का मजबूत रिश्ता हथियार बनाने और युद्ध का कारोबार करने वाली कंपनियों से है. फेलिक्स ने अपने दशकों लंबे शोधों के जरिए यह दिखाया है कि पूरी दुनिया के आदिवासी समाजों की आजादी, अस्तित्व और जीवनयापन को भारी तबाही में डालने वाले खनिजों की खोज और खुदाई का यह पूरा धंधा किस तरह युद्ध और पश्चिम से हथियारों के निर्यात के कुचक्र से जुड़ा हुआ है.
फेलिक्स जेएनयू के एक गेस्ट हाउस में बैठे हुए उन दिनों को याद कर रहे थे, जिन्होंने उनकी जिंदगी को बदल कर रख दिया. वे 1979 में एक छात्र के रूप में भारत आए. उनके शोध के विषय वे आदिवासी समाज थे, जो पिछली अनेक शताब्दियों से उस जमीन पर रहते आ रहे थे, जिसके नीचे अथाह खिनज भंडार था. ये वे समुदाय हैं, जिनकी जिंदगी की बुनियादी गतिविधियां जिन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं, वे आधुनिक उद्योगों और युद्धों के लिए महत्वपूर्ण बनते जा रहे थे.
फेलिक्स को विकासवाद के सिद्धांत के जनक चार्ल्स डार्विन के वंशज के रूप में भी जाना जा सकता है. लेकिन फेलिक्स अपनी निजी जिंदगी के तथ्यों के बारे में बात करने से बचते हैं, खास कर डार्विन से अपने संबंध के बारे में. फेलिक्स का परिवार समाजवादी रहा है और ऐसे में विकासवाद पर बात करने की असहजता को समझा जा सकता है, जिसमें प्रकृति को एक संपूर्ण और एकसार रूप में देखा गया था. फेलिक्स आज जहां खड़े हैं, वहां से डार्विन का विकासवाद बहुत दूर है, और लंदन भी.
लंदन, जहां मौजूद लंदन मेटल एक्सचेंज दुनिया के खिनज व्यापार पर और इसके साथ ही हथियारों के निर्माण की एक अहम कड़ी है. और इसीलिए फेलिक्स की दिलचस्पी भारत में जगी, जहां दुनिया के सबसे पुराने समुदाय भी बसते हैं और जहां की खिनज संपदा पर पूरी दुनिया के कॉरपोरेट जगत की निगाह शुरू से ही रही है. वे याद दिलाते हैं कि किस तरह हिटलर या उसके एक धातुविज्ञानी ने कहा था, ‘जिसका उड़ीसा के लोहे पर कब्जा होगा वह दुनिया पर कब्जा कर सकता है.’
1955 में जन्मे बचपन से फेलिक्स उस भारत के बारे में सुनते आए थे, जहां की संपदा और संसाधनों पर ब्रिटेन का साम्राज्य खड़ा था. एक ब्रिटिश मनोविश्लेषक जॉन हंटर पैडल और हिल्डा बलरे के बेटे (हिल्डा चार्ल्स डार्विन की परपोती थीं) फेलिक्स को भारत के संसाधन और ब्रिटिश समाज की संपन्नता के बीच के संबंध हमेशा से अपनी ओर खींचते रहे थे. उनके चिंतन का केंद्र यह भी रहा कि आखिर समाज कैसे बनते हैं, उनके बीच फर्क कैसे आते हैं.
इन सवालों के जवाब की तलाश करते हुए फेलिक्स खनन की दुनिया के अंधेरे तहखानों तक उतरे. वे बताते हैं कि ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने जिन आदिवासी इलाकों पर कब्जा किया उनमें धरती को संतुष्ट करने के लिए इंसानों की बलि दी जाती थी. इसे अमानवीय, बर्बर जीवनशैली मानने का रु झान पाया जाता है. लेकिन फेलिक्स ने इस पर गौर किया कि इसके बावजूद यह रिवाज कम से कम इंसानी जिंदगी की पवित्रता और इसके महान मूल्य की तरफ इशारा करता है. उन्होंने देखा कि आधुनिक कहे जाने वाले समाजों में हिंसा का स्तर कहीं ज्यादा है. उनके मुताबिक एक मुट्ठी भर अभिजात वर्ग के मुनाफे के लिए चलाए जा रहे युद्ध और हथियारों के
उद्योग और कारोबार जिस तरह टकरावों को बढ़ावा देते हैं, वे न सिर्फ समाज पर हिंसा को थोपते हैं बल्कि वे इंसानी जिंदगी की महत्ता को भी पूरी तरह नकारते हैं. इस तरह पश्चिमी समाजों से पैदा हुई ताकत और अधिकार दूसरी संस्कृतियों के लोगों को सभ्य बनाने के नाम पर उन पर थोपे जाते हैं. इस पूरी प्रक्रि या में जो क्रूरता और अमानवीयता शामिल होती है, वह इंसानी बलि से कई गुणा अधिक है.
फेलिक्स ने आदिवासी समाज को ही क्यों चुना? वे हंसते हैं, ‘इसके लिए आदिवासी इलाकों को लेकर ब्रिटिश औपनिवेशिक आकर्षण जिम्मेदार है. मेरे मन में हमेशा यह सवाल उठता रहा कि ब्रिटिश लोग भारत में शासन करने क्यों आए? और भारत में भी हमेशा वे आदिवासी इलाकों को अपने कब्जे में लाने की कोशिश क्यों करते रहे? और क्यों वे कभी इन इलाकों पर पूरा कब्जा नहीं जमा पाए? आदिवासियों से मेरे लगाव की वजह यही है. यह बात भी मुङो उनकी तरफ खींचती थी कि आखिर वह क्या था, जिसकी वजह से आदिवासियों ने कभी अपना संघर्ष नहीं छोड़ा और हमेशा लड़ाई जारी रखी.’
एक बार आदिवासी इलाके में लंबा समय गुजार लेने के बाद फेलिक्स को बार-बार वे गांव अपनी तरफ खींचते रहे. भारत में अपने निवास के बीसवें साल में वे स्थायी रूप से उड़ीसा में बस गए- अपनी उड़िया आदिवासी पत्नी के साथ रायगढ़ा जिले के एक दूर दराज के गांव में. अपने आलोचकों और कार्यकर्ताओं के प्रति मौजूदा सरकारों के दमनकारी तौर तरीकों के कारण फेलिक्स इस गांव की पहचान को आम करने से बचते हैं.
लेकिन उड़ीसा के इन गांवों में रहते हुए उन्होंने दुनिया में सत्ता के सारे तौर तरीकों को पहचानने की कोशिश की है. वे बताते हैं, ‘दुनिया में सत्ता की संरचना जिस तरह काम करती है, उसे आप आदिवासी इलाकों में बहुत आसानी से पहचान और समझ सकते हैं. यहां की पुलिस, एनजीओ, मिशनरियों और व्यवस्था के दूसरे अंगों का जो रवैया होता है, वह दुनिया की सत्ता संरचना के वास्तविक चरित्र का प्रतिनिधित्व करता है.’ दुनिया पर शासन कर रहा सत्ता तंत्र तरक्की को अपने हरेक कदम के जायज तर्क के रूप में पेश करता है. लेकिन एक मानवशास्त्री के रूप में वे तरक्की के इस दावे पर शक करते हैं.
फेलिक्स दलील देते हैं, ‘यह कैसी तरक्की है, जिसमें सीआरपीएफ आदिवासी को मारती है, उसकी जान ले लेती है और उसको यह तक भरोसा नहीं है कि वह पुलिस या अदालत के पास जाएगा तो उसे इंसाफ मिलेगा? विकास तो तब कहा जाएगा जब आदिवासी को ऐसा यकीन हो. अभी तो आदिवासी इस कथित विकास की कीमत चुका रहे हैं. रास्ते और कारखाने बनाने को तरक्की बताया जा रहा है, जबकि ये गरीबों को और गरीब बनाते हैं.’
फेलिक्स बताते हैं कि कैसे विकास की मौजूदा राजनीति के पीछे बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां और विश्व बैंक की लुटेरी नीतियां हैं, जो दुनिया भर के देशों को कर्जे में उलझा कर जनता और उसके संसाधनों को लूट रही हैं. उनका मानना है कि विश्व बैंक दुनिया की सत्ता संरचना को कर्जे के जरिए नियंत्रित करता है. वह इसके लिए निजीकरण को एक जरूरी औजार के रूप में इस्तेमाल करता है और भ्रष्टाचार का मुद्दा इसमें एक अहम भूमिका निभाता है. वे एक मिसाल देते हैं, ‘मान लीजिए विश्व बैंक के लोग अगर भुवनेश्वर आएंगे तो वे यहां के स्वास्थ्य मंत्रलय में भ्रष्टाचार को खोजेंगे. कहेंगे कि स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण कर दीजिए. लेकिन वे कभी नहीं देखेंगे कि खनन उद्योग में काम कर रही निजी कंपनियों में कितना भ्रष्टाचार है.’
यह फेलिक्स का शोध ही था, जिसने कुछ साल पहले बॉक्साइट, जिसके अयस्क से अल्युमिनियम बनता है, के खनन के लिए एक कंपनी द्वारा नियमिगरी पहाड़ की खुदाई का विरोध कर रहे कार्यकर्ताओं के पक्ष में मजबूत दलीलें मुहैया कराया था. इस शोध में फेलिक्स ने दिखाया है कि किस तरह बमबार हवाई जहाजों, एटम बमों और दूसरी युद्ध सामग्री के निर्माण में अल्युमिनियम सबसे महत्वपूर्ण धातु है और आज के युद्ध बिना अल्युमिनियम के मुमिकन नहीं हैं.
फेलिक्स के अध्ययन को पेश करने वाली तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- सैक्रि फाइिसंग पीपुल, आउट ऑफ दिस अर्थ (समरेंद्र दास के साथ) और इकोलॉजी इकोनॉमी (अजय दांडेकर और जीमोल उन्नी के साथ).
इतनी सारी चीजों के बीच वह क्या है जो एक मानवशास्त्री को उम्मीद के पैरों पर टिकाए रखता है? इसका जवाब उनकी इस बात में तलाशा जा सकता है, ‘ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1760 के बाद भारत पर नियंत्रण करने और पैसे लेने के लिए एक सहायक कंपनी बनाई जिसका नाम था गवर्नमेंट ऑफ
इंडिया और जिले का मालिक था कलक्टर. इसका पहला काम था शुल्क वसूल करना और लंदन भेजना. यह मॉडल बहुत पुराना है. लेकिन यहां जनता का प्रतिरोध भी बहुत पुराना है.’प्रतिरोध! 58 साल के इस दुबले से, पतले से, अच्छी हिंदी बोल और पढ़ लेने वाले इंसान का भरोसा और जिद एक मिसाल है.
