नयी दिल्ली : सरकार उच्चतम न्यायालय के समक्ष अगले सप्ताह समीक्षा याचिका दायर करके अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के कथित उत्पीड़न के मामले में स्वत: गिरफ्तारी और मामला दर्ज किये जाने पर रोक लगानेवाले उसके आदेश को चुनौती देगी.
सरकार में उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि शीर्ष विधि अधिकारी लगातार सामाजिक न्याय मंत्रालय के अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श कर रहे हैं, ताकि विश्वसनीय समीक्षा याचिका तैयार की जा सके. एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया, ‘समीक्षा याचिका अगले बुधवार तक दायर की जायेगी क्योंकि तब तक समीक्षा के लिए आधार तैयार हो जायेंगे.’ विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने गुरुवार को कहा कि सरकसार ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अधिनियम के संबंध में नये मानदंड निर्धारित करनेवाले उच्चतम न्यायालय के फैसले पर गौर किया है. उन्होंने कहा, ‘मैंने पहले ही अपने मंत्रालय को समीक्षा याचिका दायर करने की जरूरत पर विचार करने का निर्देश दिया है. आगे की उचित कार्रवाई की जा रही है.’
शीर्ष अदालत ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार रोकथाम अधिनियम, 1989 के तहत स्वत: गिरफ्तारी और आपराधिक मामला दर्ज किये जाने पर हाल में रोक लगा दी थी. यह कानून भेदभाव और अत्याचार के खिलाफ हाशिये पर रहनेवाले समुदायों की रक्षा करता है. लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान और केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री थावरचंद गहलोत के नेतृत्व में राजग के अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सांसदों के प्रतिनिधिमंडल ने एससी/एसटी अत्याचार रोकथाम अधिनियम के प्रावधानों को नरम बनानेवाले उच्चतम न्यायालय के फैसले पर चर्चा के लिए बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी.
गहलोत ने हाल में उच्चतम न्यायालय के फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर करने के बाद प्रसाद को पत्र लिखा था. उन्होंने कहा था कि ऐसी चिंता है कि आदेश कानून को ‘निष्प्रभावी’ बना देगा और दलितों और आदिवासियों को न्याय प्रदान करने को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगा. गहलोत ने गुरुवार को आशंका जतायी कि इस कानून के सख्त प्रावधानों को नरम किये जाने के बाद एससी/एसटी वर्ग के उत्पीड़न की घटनाओं में इजाफा होगा. केंद्रीय मंत्री का यह बयान ऐसे वक्त सामने आया है, जब मामले में राजनीति गरमाने के बीच सरकार ने शीर्ष न्यायालय के संबंधित आदेश को पुनर्विचार याचिका के जरिये चुनौती देने का फैसला किया है.
गहलोत ने यहां मीडिया के सवालों पर कहा, उच्चतम न्यायालय ने एससी/एसटी कानून की कुछ प्रक्रियाओं को लेकर जो निर्णय पारित किया है, वह न्याय सिद्धांत को प्रभावित करने वाला है. उन्होंने शीर्ष न्यायालय के फैसले के कुछ बिंदुओं का हवाला दिया और आशंका जताते हुए कहा कि कानूनी प्रावधान हल्के किये जाने से एससी/एसटी वर्ग को शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित करनेवाले लोगों के खिलाफ पुलिस की जांच और आरोपियों की गिरफ्तारी में विलंब होगा. नतीजतन इस वर्ग के उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ेंगी, अपराधियों को दंड के बजाय संरक्षण मिलेगा, जबकि पीड़ित परिवार के साथ अन्याय होगा.
केंद्रीय मंत्री ने कहा, मेरे मंत्रालय ने एससी/एसटी कानून मामले में शीर्ष न्यायालय के हालिया फैसले पर गंभीरता से विचार-विमर्श के बाद विधि मंत्रालय से अनुरोध किया था कि प्रकरण में पुनर्विचार याचिका दायर करने की आवश्यकता है. मुझे खुशी है कि विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने यह अनुरोध मंजूर कर लिया है. गहलोत ने बताया, पुनर्विचार याचिका दायर करने के लिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और विधि मंत्रालय अटॉर्नी जनरल कार्यालय के साथ विचार-विमर्श कर रहे हैं. मुझे लगता है कि तीन-चार दिन में मामले के बिंदु तय करने के बाद संभवतः अगले सप्ताह हम यह याचिका दायर करने की दिशा में आगे बढ़ जायेंगे.
उन्होंने कहा कि दलित वर्ग की नुमाइंदगी करनेवाले केंद्रीय मंत्रियों रामदास आठवले, रामविलास पासवान और अन्य सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर उनके सामने संबंधित विषय उठाया था. मोदी ने इन्हें मामले में उचित कदम उठाने का भरोसा दिलाया था जिसका परिणाम पुनर्विचार याचिका दायर करने के सरकार के फैसले के रूप में अब सामने आ चुका है. केंद्रीय मंत्री ने कहा, देश में भाजपा की अगुवाईवाली सरकारों ने हमेशा कानूनी दायरे में रहकर सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया है. हम यह काम आगे भी करते रहेंगे.
