बोरियो. पुराना दुर्गा मंदिर, बंगाली टोला में दुर्गापूजा वर्षों से हो रही है. मंदिर में बांग्ला पद्धति से देवी दुर्गा की वंदना की जाती है. विजयादशमी पर सिंदूर का खेला होता है. मंदिर में पूजा पहली बार 1832 में हुई थी. स्व मधुसूदन रक्षित ने दुर्गापूजा की शुरुआत की. 190 वर्षों से अधिक समय से इसका आयोजन होता आ रहा है. इस वर्ष भी नवरात्र के शुभारंभ पर कलश स्थापना के साथ आदिशक्ति की आराधना शुरू हो चुकी है. पूजा के आयोजक उत्साहित हैं. इस वर्ष लाखों के लागत से आकर्षक पंडाल बनाया गया है. पूजा कमेटी के सदस्य बताते हैं कि 1832 में जब पहली बार माता रानी की पूजा हुई तब मंदिर की नींव नहीं रखी गयी थी. फूस (पुआल) के झोपड़ी में माता की तस्वीर रखकर आराधना की गयी थी. वर्षों तक ऐसे ही माता की पूजा हुई. वर्ष 1896 में बंगाली समुदाय के लोगों ने आर्थिक सहयोग कर माता के लिए मंदिर की नींव रखी. 1896 में निर्मित मंदिर अब भी जस की तस है. स्व मधुसूदन रक्षित ने ही मंदिर में बांग्ला पद्धति से पूजा की शुरुआत की थी. वर्तमान समय में भी माता रानी की बांग्ला पद्धति से पूजा अर्चना होती है. श्रद्धालुओं का मानना है कि माता रानी से मांगी गयी हर मनोकामना पूर्ण होती है. इस मंदिर में सप्तमी पूजन के दिन अहले सुबह बारी कलश यात्रा निकालने की अनूठी परंपरा है. इस दिन हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. बारी कलश यात्रा के बाद मंदिर का पट खोल दिया जाता है. श्रद्धालु मंदिर प्रांगण से मोरंग नदी प्रस्थान करते हैं. मोरंग नदी तट से पुरोहित वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ कलश में जल भरवाकर मंदिर प्रांगण पहुंचते हैं. बारी कलश यात्रा पूरे बोरियो बाजार का भ्रमण करते हुए मंदिर पहुंचती है. माता के भक्ति गीतों की गूंज सुनाई देने लगती है. दशमी को बोरियो और बांझी बाजार में मेले का आयोजन होता है. इसमें बड़ी संख्या में आदिवासी पहुंचते हैं. इस दौरान सुरक्षा के भी व्यापक इंतजाम रहते हैं.
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