जायकों के बाजार में किस चीज का लग रहा छौंका, नाम बिक रहा या खाने का स्वाद ?

कई बार हम होटल जाते हैं नाम देखकर खाने का ऑर्डर कर देते हैं और जब वो डिश सामने टेबल पर आती है तब समझ आता है कि ये तो वो चीज है जो हम कई बार खा चुके हैं लेकिन अनोखे नाम ने इसके स्वाद को और तड़का लगा दिया है अब सवाल मन में यह भी आता है कि खाना बनाने वाले नाम बेचते हैं या स्वाद

सवाल यह है कि क्या कोई भी खाना बनाने-बेचने वाला अपने पाक कौशल से तैयार स्वादिष्ट व्यंजनों की कमाई करता है या नाम को ही भुना खाता है. हाल में एक बड़ी दिलचस्प खबर आयी. पेरिस में लगभग साढ़े पांच सौ साल पुराना एक रेस्तरां है- लार्जेंत. वह शहर के मशहूर गिरजा घर नॉत्रदाम के ठीक सामने है और उसकी छत पर बैठकर एफिल टावर का नजारा किया जा सकता है. इस रेस्तरां का दावा है कि राता तिवुल नाम का व्यंजन यहां के बावर्चियों ने ही ईजाद किया था. यहां लुई 14 ने भी अपने मेहमानों को दावत दी है और इंग्लैंड के शासक हेनरी चतुर्थ ने भी यहां के पकवानों का लुफ्त लिया है. यह इसके नाम का ही दबदबा है कि आज भी दुनिया भर से लोग यहां खाने पहुंचते हैं, मगर नायाब जायकों की कीमत सुनते ही साधारण व्यक्ति के होश फाख्ता हो सकते है. तीन व्यंजनों वाले टेस्टिंग मेन्यू की कीमत पांच हजार रुपये से ऊपर है, जिनमें एक पनीला सूप है और एक छोटी सी मिठाई. अगर इससे ज्यादा आजमाना चाहे, तो फिक्स्ड प्राइस मेन्यू प्रति व्यक्ति सोलह-सत्रह हजार रुपये पहुंच जाता है. अब सवाल यह है कि क्या कोई भी खाना बनाने-बेचने वाला अपने पाक कौशल से तैयार स्वादिष्ट व्यंजनों की कमाई करता है या नाम को ही भुना खाता है.

एक और कहावत है कि नाम के बड़े दर्शन के छोटे. अक्सर ऊंची दुकानों के पकवान हमारी जेब को खाली करने के बाद फीके ही साबित होते हैं. पर यह भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि कई प्रतिष्ठित रेस्तरां अपने नाम में बट्टा न लगने देने के लिए व्यंजनों की गुणवत्ता बरकरार रखने का हर संभव प्रयत्न करते हैं. इसका एक उदाहरण दिल्ली में आईटीसी मौर्या होटल है. यहां दो नामी रेस्तरां हैं बुखारा और दम पुख्त. बुखारा उत्तर-पूर्वी सीमांत के व्यंजन- तंदूरी और भुने- ढाबा अंदाज में ही बेचता है. यहां की दाल बुखारा दाल मखनी का पर्याय बन चुकी है. भले ही इसके आविष्कार का श्रेय विभाजन के बाद दरियागंज में स्थित मोती महल के मालिकान लेते हैं. इसी रेस्तरां में बनने वाली रान भी महंगी होने के बावजूद सर्वश्रेष्ठ समझी जाती है.

नाम की ही महिमा है कि यहां खाने की फरमाइश अमेरिकी राष्ट्रपति से लेकर जापानी युवराज तक कर चुके हैं. मेहमानों के नाम सुनते ही अंकल के अंधे और गांठ के पूरे ग्राहक को लगता है कि कुछ तो होगा इन नायाब जायकों में! दम पुख्त में मुंह में रखते ही घुल जाने वाला गलावट का काकोरी कबाब मिलता है, जो लखनऊ में मिलने वाले कबाब से मीलों आगे निकल चुका है. दिल्ली में यह कबाब पहले-पहल प्रकट हुआ था चाणक्यपुरी के अल-कौसर नामक खोमचे में. आज भी अल-कौसर यह कबाब बेचता है, पर खाने के शौकीन दम पुख्त के अभिजात्य कबाब को ही सर्वोपरि मानते हैं. नाम के जादू को जगा कर ही यह रेस्तरां शाही टुकड़ा और दम की बिरयानी भी बखूबी बेचता है.

नाम का कमाल पांच तारा छाप होटलों तक ही सीमित नहीं. पुरानी दिल्ली में करीम और अल-जवाहर को देसी-विदेशी पर्यटकों की चूहेदानी कहा जाता है, तो इसीलिए कि इनके नाम के साथ जुड़ी है शोहरत दिल्ली की निहारी, इस्टु, बर्रा कबाब और पसंदें की. शाकाहारी नाम सुनकर ही पराठा वाली गली का रूख करते हैं और कभी भी तटस्थ भाव से पराठों का मूल्यांकन नहीं कर पाते. यह बात चाट, कुल्फी और मिठाइयों पर भी लागू होती है. दिल्ली में ही नहीं, छोटे-बड़े हर शहर में कई ऐसे भोजनालय हैं, जिनके नाम का डंका बजता है और अद्वितीय जायके की सनद बन जाता है

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