Chanakya Niti: भागदौड़ भरी जिंदगी में हर व्यक्ति अधिक धन, सफलता और सुविधाएं पाने की चाह रखता है. लेकिन क्या कभी सोचा है कि सच्चा सुख आखिर में कहां मिलता है? आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति में स्पष्ट किया है कि जीवन का असली सुख, असली आनंद संतोष में छिपा है. चाणक्य नीति का एक प्रसिद्ध श्लोक हमें बताता है कि धन से अधिक मूल्यवान संतोष और मानसिक शांति है.
चाणक्य नीति का श्लोक (Chanakya Niti Shlok)
संतोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तिरेव च।
न च तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥
श्लोक का अर्थ
इस श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति संतोष रूपी अमृत से तृप्त है, उसे जो सुख और शांति मिलती है, वह धन के लोभ में इधर-उधर भागने वालों को कभी प्राप्त नहीं होती. अर्थात संतोषी व्यक्ति ही सच्चे सुख का अनुभव करता है.
क्या आप भी दौड़ रहे हैं ज्यादा पाने की चाह में? पढ़ें चाणक्य का संतोष मंत्र
1. मानसिक शांति का आधार होता है संतोष
संतोष मन को स्थिर और शांत बनाता है. जब व्यक्ति अपनी उपलब्धियों से खुश रहता है, तो तनाव और चिंता कम होती है.
2. लोभ से मुक्ति मिलती है संतोष से
अधिक पाने की लालसा इंसान को कभी संतुष्ट नहीं होने देती. संतोष लोभ को नियंत्रित करता है और जीवन में संतुलन बनाए रखता है.
3. सुखी जीवन का रहस्य है संतोष
धन और भौतिक वस्तुएं अस्थायी सुख देती हैं, लेकिन संतोष स्थायी आनंद देता है. यह भीतर से खुशी पैदा करता है.
4. संतोष से आती हैं संबंधों में मधुरता
संतोषी व्यक्ति दूसरों से ईर्ष्या नहीं करता, जिससे रिश्तों में प्रेम और विश्वास बना रहता है.
चाणक्य नीति के अनुसार, जीवन में अपार धन से ज्यादा जरूरी है संतोष. जो व्यक्ति अपनी परिस्थितियों को स्वीकार कर मेहनत करता है और जो मिला है उसमें खुश रहता है, वही सच्चे अर्थों में सुखी और सफल कहलाता है.
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