Exclusive: दस साल पहले जुबली का आईडिया आया था और सात सालों से इस पर काम हो रहा था - विक्रमादित्य मोटवानी

विक्रमादित्य मोटवानी ने कहा कि जुबली का रिस्पॉन्स बहुत अच्छा मिल रहा है. जर्नलिस्ट से लेकर सोशल मीडिया तक सभी तरफ तारीफ हो रही है. जिससे मैं बहुत खुश हूं. खास बात ये है कि मुझे कई क्रिएटर्स और डायरेक्टर ने बोला कि इस सीरीज में तुमने ये अच्छा किया है.

अमेज़न प्राइम वीडियो की वेब सीरीज जुबली इन-दिनों जमकर सुर्खियां बटोर रही है. यह सीरीज सिनेमा के सुनहरे दौर को परदे पर जीवन्त करती है. इस सीरीज को बनने में सात साल का लम्बा वक़्त गुज़रा है. इस सीरीज के निर्देशक विक्रमादित्य मोटवानी से उर्मिला कोरी की हुई बातचीत…

आपको निजी तौर पर किस तरह के रिस्पांस मिल रहे हैं?

रिस्पॉन्स बहुत अच्छा मिल रहा है. जर्नलिस्ट से लेकर सोशल मीडिया तक सभी तरफ तारीफ हो रही है. जिससे मैं बहुत खुश हूं, जो भी रिस्पॉन्स मिल रहा है. खास बात ये है कि मुझे कई क्रिएटर्स और डायरेक्टर ने बोला कि इस सीरीज में तुमने ये अच्छा किया है. वो अच्छा किया है, तो वो तारीफ़ और कमाल की हो जाती है.

इस सीरीज में 40 और 50 के दशक को बहुत ही डिटेलिंग के साथ पर्दे पर लाया गया है, बजट और रिसर्च वर्क क्या रहा था?

बजट के बारे में इंडस्ट्री में एक जोक है कि कितना भी बड़ा बजट मिला हो, फिल्मकार बोलेगा कि कम था. मैं ये बोलूंगा कि ये बहुत ही महत्वकांक्षी शो है. अमेज़न ने बहुत ही ठीक तरीके से इसे बैक किया है. अच्छा बजट दिया है. रिसर्च की बात करुं, तो दो तरह की रिसर्च होती है. एक होता है, उस टाइम पीरियड के लिए, तो उस ज़माने में कॉस्ट्यूम या फिल्म मेकिंग का प्रोसेस या दूसरी टेक्निकल जानकारियां कि टिकट कैसे होते थे, कमरे का डिजाइन, आर्ट डेकोर यह नार्मल रिसर्च है. दूसरा था इंडस्ट्री के बारे में आप कहानी सुनते आ रहे हो या उस दौर के सामाजिक और राजनीतिक हालात के बारे में जानना, तो वो एक अलग तरह का रिसर्च था. इस दुनिया को बनाने का अपना मज़ा था, जो हम सुन चुके हैं या जी चुके हैं. मैं बीस साल से इंडस्ट्री में हूं. ऐसी कहानियों को सुनते हुए बड़ा हुआ हूं. इस डायरेक्टर ने ऐसे काम किया था. ऐसे मज़े से शॉट लिया था. कुलमिलाकर एक रिसर्च बनता है.

इस सीरीज का आईडिया कब आया था और इस पर आपने काम कब शुरू किया ?

2013 में आईडिया होता है. उस वक़्त विदेशी हाउस ऑफ़ कार्ड्स जैसे शोज आ चुके थे. मुझे लगा कि हिंदी सिनेमा पर हमें भी कोई सीरीज बनानी चाहिए. राइटिंग का काम 2016 में शुरू हुआ था. 2018 तक हम लिख रहे थे. 2019 में हमने प्री प्रोडक्शन का काम शुरू किया. 2020 में शूटिंग शुरू करने वाले थे, पेंडेमिक आ गया. 2021 में शुरू किया, तो फिर सेकेंड वेव आ गयी. वापस रुक कर फिर हमने जुलाई 2021 में शूटिंग शुरू की. फिर करते-करते 2021 में हमने शूट खत्म किया. आईडिएशन और राइटिंग प्रोसेस में थोड़ा ज़्यादा टाइम लगा. फिजिकल प्रोडक्शन में उतना टाइम लगता नहीं है. वैसे ये जो टाइम मिला वो हमारे लिए आशीर्वाद की तरह था, जिसमे अतुल को स्क्रिप्ट लिखने में काफी टाइम मिला. उसने बड़े प्यार से स्क्रिप्ट लिखा और उसका असर पर्दे पर भी दिख रहा है.

क्या यह सीरीज पूरी तरह से सेट बनाकर ही शूट हुई है?

टॉकीज का जो कंपाउंड है. बंबई की सड़के हैं, स्टूडियोज के जो फ्लोर्स हैं, ऑफिसेज हैं. प्रोजेक्शन थिएटर, प्रोजेक्शन रूम सब सेट ही है. हां कुछ कुछ सीन हमने असल थिएटर में भी शूट की है. लिबर्टी थिएटर, मराठा मंदिर,विशाल टॉकीज इनमें भी सीरीज की शूटिंग हुई है. मुंबई, मंसूरी, दिल्ली और लख़नऊ में शूटिंग हुई है. जो रिफ्यूजी कैम्प है. वो पूरा लखनऊ में शूट किया है. लखनऊ के सीतापुर में शूटिंग हुई है. पूरी शूटिंग में तीन महीने का टाइम गया है.

क्या शुरू से ही तय था कि आप 40 और 50 के दशक के सिनेमा की ही कहानी कहेँगे?

हां सोच यही थी कि उस ज़माने के लोग बहुत ज्यादा अट्रैक्ट करते थे. लार्जर देन लाइफ उनकी ज़िन्दगी थी. क्या करना था. क्या करते थे. वो सब बहुत आकर्षित करता था.

क्या 50 के दौर से आगे की कहानी को को ले जाने की भी प्लानिंग है?

प्लान है, अगर मौका मिलता है, तो जरूर बनाएंगे. मुझे लगता है कि 80 के दशक तक तो हिंदी सिनेमा की बहुत ही रोचक जर्नी रही है. उसके आगे का फिर देख लिया जाएगा.

उस दौर और आज के दौर में क्या समानता और असमानता पाते हैं?

बड़े पर्दे के लिए बड़ी कहानियां बनाना हर दौर में एक सा रहा है. हां, आजकल हम रिस्क कम लेते हैं. उस ज़माने में हम ज़्यादा लेते थे.

सिद्धांत और अपारशक्ति ने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन उनको कहानी का चेहरा बनाना कितना मुश्किल था

वह ओरिजिनल चॉइस ही थे. आप स्थापित एक्टर्स को कैसे वो सब करवाएंगे. दोनों ही एक्टर्स बहुत कमाल का काम किया है. मैं शुक्रगुज़ार हूं कि अमेजॉन प्राइम वीडियो ने मेरी सोच पर यकीन किया.

इस सीरीज में जिसमे तरह से आपने 40 और 50 के दशक को परदे पर दिखाया है, उसमें भंसाली की छाप दिखती है, आपने उनको असिस्टट किया है, क्या आपकी इंस्पिरेशन रहे हैं?

इंस्पिरेशन नहीं कहूंगा. काम करके एक एबिलिटी आती है कि बड़ा सा सेट क्रिएट करके कैसे शूट करते हैं. वह सिर्फ उनको ही आता है और मेरे लिए अच्छी बात ये थी कि मैंने उनके साथ वो काम किया है. किस तरह से बड़ा सेट, जूनियर और एक्टर्स के साथ काम करना है. ये निश्चित तौर पर भंसाली सर से सीखने से को मिला है. इसके अलावा कैसे गाने को टेक्निकली शूट कर सकते हैं. मैंने वो भी उनसे ही सीखा है.

सारे एपिसोड़ को एक साथ रिलीज ना करके अलग -अलग रिलीज किया गया है, आपका इस पर क्या कहना है?

जैसे फिल्म में इंटरवल होता है. यह इंटरवल पॉइंट था. लोग इसे इस तरह से ले, मुझे लगता है कि इससे उत्साह बढ़ता है और लोग देखने के लिए आएंगे प्लेटफार्म पर आएंगे.

इस सीरीज को लेकर एक आलोचना यह भी सामने आ रही है कि 40 का दौर है, लेकिन गालियां भरी पड़ी हैं?

मैं पूछना चाहता हूं कि उस ज़माने में कोई गाली देता नहीं था क्या. हां उस ज़माने में पिक्चरों में गाली नहीं होती थी और हमने उस ज़माने के पिक्चर में गालियां नहीं ही दिखाई हैं, लेकिन ये बोलना कि उस ज़माने में लोग गाली देते नहीं थे. ये गलत है. मैं जानता हूं कि गाली देते थे, क्योंकि मेरे दादा-परदादा की कहानियां में सुन चुका हूं. मुझे पता है कि मेरे पापा को कैसे सुबह उठाया जाता था. उस ज़माने के लोग एकदम सती सावित्री नहीं होते थे.

अपकमिंग प्रोजेक्ट्स

अनन्या पांडे के साथ एक फिल्म बनायीं है, कण्ट्रोल करके, वो आएगी.

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लेखक के बारे में

Author: कोरी

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