Toofaan Movie Review : फरहान अख्तर के दमदार अभिनय के बावजूद बेदम निकला यह 'तूफान'

Toofaan Movie Review : साल 2013 में निर्देशक राकेश ओम प्रकाश मेहरा और अभिनेता फरहान अख्तर की जुगलबंदी ने परदे पर भाग मिल्खा भाग के ज़रिए हिंदी सिनेमा को एक यादगार और बेहतरीन फ़िल्म दी. 8 साल बाद ये जोड़ी साथ दिखी फ़िल्म का नाम तूफान भी था तो उम्मीदें बढ़ जाना लाजमी ही था

Toofaan Movie Review

फ़िल्म – तूफान

निर्देशक – राकेश ओम प्रकाश मेहरा

निर्माता – फरहान अख्तर, राकेश ओमप्रकाश मेहरा

कलाकार- फरहान अख्तर, मृणाल ठाकुर, परेश रावल, मोहन आगशे, सुप्रिया पाठक, दर्शन कुमार और अन्य

प्लेटफार्म- अमेज़न प्राइम वीडियो

रेटिंग – दो

साल 2013 में निर्देशक राकेश ओम प्रकाश मेहरा और अभिनेता फरहान अख्तर की जुगलबंदी ने परदे पर भाग मिल्खा भाग के ज़रिए हिंदी सिनेमा को एक यादगार और बेहतरीन फ़िल्म दी. 8 साल बाद ये जोड़ी साथ दिखी फ़िल्म का नाम तूफान भी था तो उम्मीदें बढ़ जाना लाजमी ही था लेकिन पर्दे पर जो भी नज़र आया वह हवा का एक झोंका भर ही साबित हुआ है.

फ़िल्म की कहानी टिपिकल मसाला फ़िल्म की तरह है. डोंगरी का रहने वाला अज़्ज़ु भाई (फरहान अख्तर) वसूली का काम करता है. उसकी ज़िन्दगी में तोड़ने फोड़ने का काम चल रहा होता है कि उसकी मुलाकात डॉक्टर अनन्या (मृणाल ठाकुर) से होती है और ज़िन्दगी को मकसद मिल जाता है.

अज़्ज़ु भाई से अज़ीज़ अली बॉक्सर का सफर शुरू हो जाता है. बॉक्सिंग में वह अपना एक नाम बना लेता है लेकिन फिर ज़िन्दगी के बदलते हालातों में ऐसा कुछ हो जाता है कि उससे बॉक्सिंग छीन जाती है और अनन्या भी. ज़िन्दगी में सबकुछ खो देने के बाद वह किस तरह से वापसी करता है. आगे की कहानी उसी की है.

फ़िल्म की कहानी का आईडिया फरहान का था. जिसे स्टोरी और स्क्रीनप्ले की शक्ल अंजुब राजाबली और विशाल मौर्या ने दी है. इस टीम ने कहानी और स्क्रीनप्ले के नाम पर परदे पर जो भी दिया है. वो शुरुआत से अंत तक पूरी तरह से प्रेडिक्टेबल है. कुछ भी नयापन लिए नहीं है. फ़िल्म आपको पंगा, सुल्तान जैसी कई स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्मों की याद दिलाएगी.

फ़िल्म की कहानी में रोचक ट्विस्ट एंड टर्न गायब है इसके साथ ही यह तीन घंटे की फ़िल्म में सबकुछ बहुत जल्दी जल्दी हो रहा है. जिससे यह स्पोर्ट्स ड्रामा फ़िल्म ना तो आपको जोश से भरती है ना ही इमोशनल कर पाती है. फ़िल्म में अज़्ज़ु भाई अज़ीज़ अली कुछ दृश्यों में बन जाता है. कुछ मिनटों में कोच परेश रावल का दिल भी जीत लेता है. स्टेट चैंपियन भी बन जाता है फिर परेश रावल से पंगा. लव जिहाद का मुद्दा आ जाता है. प्यार और परिवार के बाद फिर बॉक्सिंग. बॉक्सिंग के ज़्यादातर मैच एकतरफा हैं वो रोमांच पैदा नहीं कर पाए हैं. जो स्पोर्ट्स ड्रामा की बड़ी जरूरत थी.

कमज़ोर कहानी को और कमज़ोर उसकी एडिटिंग कर गयी है। फ़िल्म की लंबाई अखरती है जिसे 30 से 35 मिनट आसानी से कम किया जा सकता था. कुलमिलाकर यह कहानी अधिक गहराई से कहे जाने की ज़रूरत थी. कुछ नया और लीक से हटकर जिसके लिए निर्देशक राकेश ओम प्रकाश मेहरा जाने जाते हैं. यह अंडर डॉग की कहानी थी जिसमें लव जिहाद और खेल संघ की धांधली भी थी. बायोपिक नहीं थी तो क्रिएटिव लिबर्टी लेकर कुछ सशक्त बनाया जा सकता था.

इस फ़िल्म की सबसे बड़ी यूएसपी इसकी कास्टिंग है.कलाकारों की एक्टिंग ही थी जो यह प्रेडिक्टेबल कहान थोड़ी एंगेजिंग बन गयी है. फरहान अख्तर ने अज़्ज़ु भाई से बॉक्सर अज़ीज़ अली बनने के ट्रांसफॉर्मेशन को अपनी बोलचाल, हाव भाव के साथ पूरी बारीकी के साथ जिया है. परेश रावल एक बार फिर अपने संजीदा अभिनय से किरदार को खास बना देते हैं. मृणाल ठाकुर फ़िल्म दर फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी उपस्थिति को सशक्त बनाती जा रही हैं. तूफान भी उसी की अगली कड़ी है. हुसैन दलाल ने अपने अभिनय से सरप्राइज किया है.सुप्रिया पाठक और विजय राज को करने को कुछ खास नहीं था. दर्शन कुमार सीमित स्क्रीन स्पेस में भी याद रह जाते हैं.बाकी के किरदारों ने भी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है.

फ़िल्म के म्यूजिक की बात करें तो शंकर एहसान लॉय का म्यूजिक इस बार जादू नहीं जगा पाया है. रैपर डेविल के दो गाने फ़िल्म के म्यूजिक पक्ष को ज़रूर थोड़ा संभालते हैं. फ़िल्म के संवाद कहानी के अनुरूप है. कुलमिलाकर उम्मीदों पर यह फ़िल्म खरी नहीं उतरती है.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Author: कोरी

Published by: Prabhat Khabar

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.

Read More

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >