“पंकज त्रिपाठी का जन्मदिन कब है?” यह सवाल सुनते ही शायद ज्यादातर फैंस एक तारीख बता देंगे. लेकिन पंकज त्रिपाठी की कहानी में यहां एक दिलचस्प ट्विस्ट है. उनकी जिंदगी में जन्मदिन से जुड़ी दो तारीखें हैं. और मजेदार बात यह है कि इस कहानी के पीछे कोई फिल्मी वजह नहीं, बल्कि उनके बचपन का एक किस्सा है. आज पंकज त्रिपाठी की गिनती हिंदी सिनेमा और ओटीटी के चर्चित कलाकारों में होती है. ‘मिर्जापुर’ के कालीन भैया ने उन्हें घर-घर में पहचान दी है. लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने से पहले उन्होंने ऐसा दौर देखा है, जिसके बारे में जानकर शायद आपको यकीन करना मुश्किल हो कि यही अभिनेता आगे चलकर इतना बड़ा नाम बनेगा.
एक नहीं, दो तारीखों से जुड़ा है जन्मदिन
पंकज त्रिपाठी की जन्मतिथि को लेकर बचपन में एक दिलचस्प स्थिति बनी थी. स्कूल में दाखिले के समय परिवार के पास उनकी जन्मतिथि को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं थी. बताया जाता है कि उनके भाई को सही तारीख याद नहीं थी. ऐसे में एक शिक्षक ने 5 सितंबर, यानी शिक्षक दिवस, की तारीख लिखने की सलाह दी. शिक्षक को यह तारीख शुभ लगी और उन्होंने पंकज के उज्ज्वल भविष्य की बात भी कही. हालांकि पंकज त्रिपाठी की वास्तविक जन्मतिथि 28 सितंबर बताई जाती है. यानी एक तारीख कागजों में दर्ज हुई और दूसरी उनकी वास्तविक जन्मतिथि रही. यही वजह है कि पंकज के जन्मदिन से जुड़ा यह किस्सा बाकी सितारों से बिल्कुल अलग है. लेकिन असली कहानी यहां से शुरू होती है.
बिहार के गांव से निकला लड़का आखिर मुंबई तक कैसे पहुंचा?
पंकज त्रिपाठी का बचपन बिहार के गोपालगंज जिले के बेलसंड गांव में बीता. उनका परिवार बेहद साधारण था. उनके पिता खेती के साथ धार्मिक काम भी करते थे. पंकज का झुकाव बचपन से ही अभिनय की तरफ था. गांव में होने वाले नाटकों में हिस्सा लेते हुए उन्हें महसूस हुआ कि एक्टिंग ही वह रास्ता है, जिस पर वह आगे बढ़ना चाहते हैं. लेकिन गांव के मंच से मुंबई के बड़े पर्दे तक का सफर इतना आसान नहीं था. उन्होंने एक्टिंग की ट्रेनिंग ली और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से पढ़ाई पूरी की. इसके बाद वह मुंबई पहुंचे, जहां उन्हें उस चीज का सामना करना पड़ा, जिसका सपना देखने वाले हर नए कलाकार को डर होता है- काम का इंतजार.
एक्टिंग आती थी, लेकिन काम नहीं मिल रहा था
मुंबई में पंकज त्रिपाठी ने छोटे-छोटे किरदारों से शुरुआत की. कई बार स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी कुछ मिनटों की होती थी. कई बार ऑडिशन देने के बाद भी बात आगे नहीं बढ़ती थी. एक्टर बनने का सपना था, लेकिन उससे घर चलाना आसान नहीं था. यहीं उनकी जिंदगी में उनकी पत्नी मृदुला त्रिपाठी का साथ सबसे ज्यादा मायने रखता है.
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जब पत्नी की सैलरी से चलता था घर
संघर्ष के दिनों में मृदुला नौकरी करती थीं. घर की आर्थिक जिम्मेदारियों को संभालने में उनकी कमाई बेहद अहम थी. सोचिए, एक तरफ पंकज मुंबई में अपने सपने के लिए लगातार कोशिश कर रहे थे और दूसरी तरफ परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने की जिम्मेदारी पत्नी संभाल रही थीं. आज जब पंकज त्रिपाठी के पास बड़े प्रोजेक्ट्स और लोकप्रिय किरदार हैं, तब उनके संघर्ष के इस दौर को याद करना उनकी सफलता को और खास बना देता है. क्योंकि उस वक्त उनके पास सफलता की कोई गारंटी नहीं थी. सिर्फ एक चीज थी- उन्हें भरोसा था कि वह एक दिन अपनी पहचान जरूर बनाएंगे.
फिर आया ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ का वो मौका
साल 2012. अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ आई और पंकज त्रिपाठी के करियर ने ऐसी करवट ली, जिसने उनकी पूरी दिशा बदल दी. फिल्म में उन्होंने सुल्तान कुरैशी का किरदार निभाया. यहां कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यह है कि पंकज ने इस किरदार को सिर्फ निभाया नहीं, बल्कि उसमें अपनी ऐसी छाप छोड़ी कि दर्शकों की नजर उन पर टिक गई. चेहरे पर सख्ती, संवादों में ठहराव और किरदार का खतरनाक अंदाज. पंकज की अदाकारी ने सुल्तान कुरैशी को यादगार बना दिया. जिस अभिनेता को कभी काम के लिए इंतजार करना पड़ता था, अब उसी के अभिनय की चर्चा इंडस्ट्री में होने लगी. यही वह मोड़ था, जहां संघर्ष की कहानी धीरे-धीरे सफलता की कहानी बनने लगी.
लेकिन पंकज को अभी अपना सबसे बड़ा किरदार नहीं मिला था
‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के बाद पंकज त्रिपाठी को लगातार बेहतर मौके मिलने लगे. ‘फुकरे’, ‘बरेली की बर्फी’, ‘स्त्री’ और ‘मिमी’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी. लेकिन उनके करियर का सबसे बड़ा पॉप कल्चर मोमेंट अभी बाकी था. फिर ओटीटी पर एक सीरीज आई. नाम था- ‘मिर्जापुर’. और इसी सीरीज ने पंकज त्रिपाठी को वह नाम दिया, जिसे आज शायद उनके असली नाम से भी ज्यादा लोग जानते हैं.
‘मिर्जापुर’ का कालीन भैया और बदल गई पहचान
कालीन भैया के रूप में पंकज त्रिपाठी ने ऐसा किरदार निभाया, जिसमें खामोशी भी डर पैदा करती थी. वह ज्यादा चिल्लाते नहीं थे, लेकिन उनके चेहरे का भाव ही बहुत कुछ कह देता था. उनकी आवाज में ठहराव था और फैसलों में खतरनाक सख्ती. यही अंदाज दर्शकों को पसंद आया. धीरे-धीरे पंकज त्रिपाठी से ज्यादा ‘कालीन भैया’ नाम लोगों की बातचीत का हिस्सा बनने लगा. किरदार इतना लोकप्रिय हुआ कि सोशल मीडिया से लेकर मीम्स तक हर जगह इसकी चर्चा होने लगी.
