Dhurandhar 2 :वेटरन गीतकार समीर को धुरंधर के गीत संगीत से इस वजह से है नाराजगी

वेटरन गीतकार समीर ने इस इंटरव्यू में हिंदी सिनेमा में गीत संगीत से जुड़ी चुनौतियों पर बात की है

dhurandhar 2 :बॉलीवुड के प्रसिद्ध गीतकार समीर अनजान, जिन्हे नाम कई पुरस्कार होने के साथ साथ गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी नाम दर्ज है। हाल ही में उन्होंने अपना नया म्यूजिक लेबल शुरू किया है. इस नए म्यूजिक लेबल और गीत संगीत की जर्नी, विवाद सहित कई पहलुओं पर उर्मिला कोरी से हुई बातचीत

अपना म्यूजिक लेबल शुरू करने के पीछे की वजह क्या थी?

अभी जिस तरह की सिचुएशन चल रही थी, वैसी फिल्में मुझे नजर आ रही थीं. न कोई प्लेटफॉर्म मुझे समझ आ रहा था, तो मुझे लगा कि ऐसा प्लेटफॉर्म क्रिएट किया जा सके, जिसमें फ्रीडम ऑफ क्रिएटिविटी हो, जहां मुझे किसी सिलेक्टर की जरूरत न पड़े. मुझे वही गाना करना है, जो मेरे फैंस मुझसे चाहते हैं, जो वे हमसे सुनना चाहते हैं. अभी सबकुछ डिजिटल हो गया है, तो आपको सर्वाइव करने के लिए सिनेमा ही एक प्लेटफॉर्म नहीं है. आज लोग बिहार के छपरा में बैठकर डिजिटल माध्यम से करोड़ों रुपये कमा रहे हैं. बस आपमें प्रतिभा होनी चाहिए. मैंने सोचा कि घर पर बैठने या खराब काम करके अपना ब्रांड खराब करने से बेहतर है कि एक नयी शुरुआत की जाये. इसी वजह से हमने दो प्लेटफॉर्म शुरू किये-अमोरा म्यूजिक और समाइरा क्रिएशन्स. कुछ अलग करने के लिहाज से ही अरिजीत ने भी फिल्मों के गीत-संगीत से दूरी बना ली.

म्यूजिक लेबल से क्या योजनाएं हैं?

सिंगल्स पर फोकस रहेगा. आजकल तो सिंगल हिट हो जाने के बाद फिल्म वाले उसे खरीदकर अपनी फिल्मों में इस्तेमाल करते हैं. इसमें म्यूजिक के साथ-साथ मेरा टॉक शो भी रहेगा. साथ ही नये टैलेंट को भी हम मौका देंगे. सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया भर के नये चेहरों को मौका देंगे.

फिल्मों के गीत-संगीत में क्या बदलाव आप पा रहे हैं, जिसने आपको दूरी बनाने को मजबूर कर दिया?

‘धुरंधर’ इतनी बड़ी हिट रही है, लेकिन उसमें गानों को बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह ट्रीट किया गया है. मुझे इससे दिक्कत है. मेरा इतना बड़ा हिट ‘हम प्यार करने वाले’ को बैकग्राउंड में डाल दिया गया था. ऐसे में कोई अच्छा क्रिएटर कैसे काम करेगा?हम उस दौर के लोग हैं, जब म्यूजिक को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता था. म्यूजिक के लिए फिल्में बनती थीं. ‘आशिकी’ फिल्म के लिए पहले म्यूजिक बना, फिर फिल्म की कहानी लिखी गयी. अब तो म्यूजिक को ‘फिल इन द ब्लैंक’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है. मेकर्स कहते हैं, भाई, कुछ नहीं है तो गाना गा दो. ऐसे में कोई कैसे काम कर सकता है? पहले म्यूजिक डायरेक्टर ही नहीं, प्रोड्यूसर और डायरेक्टर भी हमारे साथ बैठते थे. चार से पांच घंटे जैमिंग चलती थी. अभी तो कोई कहानी नहीं सुनाता, बस कॉल आता है, हिट गाना दे दो. अरे, कोई हिट गाना पॉकेट में लेकर घूम रहा है क्या? कहानी और किरदार से गाने अच्छे बनते थे. ओटीटी पर सेक्स और वायलेंस है, तो आप वहां पर क्या म्यूजिक देंगे? जितने टॉप लेवल के लोग हैं, वो कन्फ्यूजन वाले मोड में चले गये हैं. ट्रांजिशन पीरियड में उन्हें समझ ही नहीं आ रहा है कि क्या करना है, क्या नहीं. आप साउथ वालों से सीखिए, आज भी वे उसी पैटर्न पर म्यूजिक बना रहे हैं.

गीत-संगीत में जिन्गोइज्म के हावी होने की भी बात आती है?

गीतकार को किसी को दोष देने की जरूरत नहीं है. सब कुछ कहानियों पर निर्भर करता है. कहानियां उस तरफ मुड़ रही हैं, तो बेचारा गीतकार क्या करे. डायरेक्टर उस तरह की फिल्में बनाना चाहते हैं, तो कम्पोजर क्या करेगा? हमारा काम ही है फिल्म के अनुसार गीत लिखना. अपने हिसाब से नहीं लिख सकते हैं.

बीते दिनों नोरा फतेही और संजय दत्त के एक गाने की अश्लीलता पर जमकर बवाल मचा था. गीतों में अश्लीलता के मुद्दे पर आपकी क्या राय है?

‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों में गाली पर गाली है, तो गीत कैसे वल्गैरिटी से बचेंगे. अगर सब कुछ खुल गया है, सबको छूट दे दी गयी है, तो इस समाज में अच्छे-बुरे हर तरह के लोग रहते हैं. पहले लोगों में डर था, समाज के प्रति जिम्मेदारी थी. अभी किसी को अपने जमीर और जिम्मेदारी का ख्याल नहीं है, तो सब लिख रहे हैं. हमारी दिक्कत यह है कि हम हर बात के लिए सिर्फ राइटर को ही दोष देते हैं. ‘जिन्हें हिंद पर नाज़ है’ वाली सोच से फिल्में बनेंगी, तभी कुछ बेहतर लिखा जायेगा. हमें फिल्मों और गानों में अश्लीलता के लिए मेकर्स को घेरना चाहिए, सिर्फ राइटर को नहीं.

आपके मेंटर कौन रहे हैं?

मेरे दो ही मेंटर हैं. मजरूह सुल्तानपुरी और आनंद बक्शी. इनको मैंने बहुत पढ़ा है. करीब से जाना है. इन दोनों से मिला हूं. बहुत कुछ सीखा है. वे मेरे गुरु थे. मेरे लिए पिता समान थे.

एआइ को म्यूजिक इंडस्ट्री के लिए खतरा बताया जा रहा है. आप इसे किस तरह से देखते हैं?

क्रिएटिव लोगों के लिए कोई खतरा नहीं है. खतरा उन चीजों के लिए है, जो प्रजेंट में हैं. हमारे गानों को उलट-पुलट करके एआइ अच्छा या बुरा कर सकता है, लेकिन हमारे जो गाने बने ही नहीं हैं, उनको एआइ कैसे लेकर आ सकता है. एआइ सब कुछ क्रिएट कर सकता है, लेकिन इमोशन क्रिएट नहीं कर सकता है. एआइ का दिल नहीं टूटा है. उसको भाई-बहन का इमोशन पता नहीं है. मुझे लगता है कि म्यूजिक वर्ल्ड के लिए एआइ अच्छा है. कुछ भी म्यूजिक सुनना है, एक क्लिक पर पूरी दुनिया म्यूजिक आपके लैपटॉप पर आ जाता है.

आपने कहा कि पूरी दुनिया का म्यूजिक एक क्लिक पर उपलब्ध है, इससे कॉपी म्यूजिक की पोल भी अब खुलने लगी है. आप इंस्पिरेशन और कॉपी को किस तरह परिभाषित करेंगे?

मैं बताना चाहूंगा कि जावेद साहब के साथ मिलकर हमने पंद्रह से बीस साल तक लगातार कोशिश की, तब जाकर अपना कॉपीराइट हासिल किया, वरना पहले हमारा कोई कॉपीराइट ही नहीं होता था. 2012 में बिल पास होने के बाद यह तय हो गया कि अब कॉपी करके बचा नहीं जा सकता. जहां तक इंस्पिरेशन और कॉपी की बात है, तो क्रिएटिविटी में इंस्पिरेशन जरूरी है. असली क्रिएटर सिर्फ ईश्वर है, जो किसी से प्रेरणा नहीं लेता. उनके अलावा हर कोई किसी न किसी से इंस्पायर होता ही है. मैं अपनी बात करूं तो मैं बचपन से ‘हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे’ गाने की लाइनों से बहुत प्रभावित था. उसी से प्रेरित होकर मैंने ‘सांसों की जरूरत है जैसे’ लिखा. इस तरह के इंस्पिरेशन में कोई बुराई नहीं है.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Urmila Kori

I am an entertainment lifestyle journalist working for Prabhat Khabar for the last 14 years. Covering from live events to film press shows to taking interviews of celebrities and many more has been my forte. I am also doing a lot of feature-based stories on the industry on the basis of expert opinions from the insiders of the industry.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >