Exclusive: झारखंड में फिल्म निर्माण की असीम संभावनाओं को पॉलिटिकल विल की जरूरत है- राजेश जैस

कई टीवी धारावाहिकों, फिल्मों और वेब सीरीज का अहम हिस्सा रहे अभिनेता राजेश जैस रांची से हैं. वे झारखंड में फ़िल्म निर्माण से जुडी असीम संभावनाओं को पाते हैं. झारखंड स्थापना दिवस के इस खास मौके पर इन्ही संभावनाओं पर उर्मिला कोरी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश...

कई टीवी धारावाहिकों, फिल्मों और वेब सीरी का अहम हिस्सा रहे अभिनेता राजेश जैस रांची (झारखंड) से हैं. वे झारखंड में फ़िल्म निर्माण से जुड़ी असीम संभावनाओं को पाते हैं. जो भविष्य में फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में झारखंड को एक खास पहचान दे सकता है. झारखंड स्थापना दिवस के इस खास मौके पर इन्ही संभावनाओं पर उर्मिला कोरी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश…

झारखंड में फ़िल्म निर्माण की संभावनाओं को आप किस तरह देखते हैं?

असीम संभावनाएं हैं, पूरे भारत को 40 प्रतिशत मिनरल झारखंड से मिलता है.जंगल, पहाड़, झरने ऐसे हैं, जो अभी तक एक्सपोज नहीं हुए हैं. ट्राइबल कल्चर यहाँ का बहुत खास है.साउथ सिनेमा जमीन से जुडी कल्चरल चीज़ें दिखा रहा है. कंतारा अभी हालिया उदाहरण हैं. झारखंड की आदिवासी जनजातियाँ जिस तरह से सादगी से प्रकृति के साथ जी रह रही हैं. वह दुनिया को दिखाने की ज़रूरत है. टाना भगत वाली जनजाति भी बहुत खास है. टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए फिल्मों से बड़ा माध्यम कौन हो सकता है. फ़िल्म फेस्टिवल्स में दुनिया के प्रीमियम लोग आते हैं. उस फिल्म के माध्यम से वहां झारखंड को भी जानेगे. यशराज ने स्विट्ज़रलैंड को अपनी फिल्मों में दिखाकर उसे एक बड़ा टूरिस्ट स्पॉट बना दिया था.

जामताड़ा वेब सीरीज, झारखंड की कहानी होने के बावजूद यहाँ शूट नहीं हुई थी, ऐसे कई उदाहरण हैं, आपको कमी कहाँ लगती है ?

झारखंड में फ़िल्म इंडस्ट्री बने, तो सबसे अहम है कि सड़कों की कनेक्टिविटी अच्छी हो. वहां वनिटी वैन जा सके. कोई 10 किलोमीटर चलकर वाटर फॉल तक नहीं जाना चाहेगा. होटल इंडस्ट्री का बढ़िया नेटवर्क हो. सड़के साफ सुथरी हो. रांची का बड़का तलाब पर कौन शूट करना चाहेगा. जलकुम्भी से भरा पड़ा है. ये सब ठीक हो जाएंगे, अगर पॉलिटिकल विल हो. वही से सारी दिक्कत शुरू होती है. मैंने खुद ऐसी दो वेब सीरीज की है. जो झारखंड के रांची की कहानी थी. मैंने प्रोडूसर्स को वहां भेजा भी था. वे रेकी करके आए भी थे, लेकिन एक शूट हुई छत्तीसगढ़ में और दूसरी नाशिक के आसपास भोर करके जगह है वहां, परदे पर भले वह झारखंड बोल रहे हो, लेकिन फायदा छत्तीसगढ़ और नाशिक हो हुआ. कोई भी यूनिट चलती है, तो 70 से 100 लोगों की यूनिट चलती है. मान लीजिए फ़िल्म क़ा बजट 25 करोड़ है, वो 10 करोड़, तो वहां खर्च करके आएगा, जिस जगह कहानी शूट होने गयी है. ऐसे में उस जगह पर रोजगारी बढ़ेगी, होटल, ड्राइवर्स, केटर्स हर किसी इंडस्ट्री को फायदा.

झारखंड की कहानी होने के बावजूद लोगों की पसंद छत्तीसगढ़, लखनऊ और भोपाल है, क्यूंकि वहां का सरकारी महकमा पूरा सपोर्टिंव है. वहां पॉलिटिकल विल है कि आप शूटिंग करने आइए. किसी तरह कि तकलीफ हो तो हमें बताइए,पुलिस और दूसरे महकमे हैं, उनको ऊपर से इंस्ट्रक्शन है कि भईया इनको कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए. जिस वजह से कोई गुंडागिरी और भाईगिरी नहीं चलती है. ज़ब पूरा माहौल अच्छा रहेगा, तो ही हम अपने हीरो -हीरोइन को लेकर वहां शूटिंग पर जाएंगे. जहाँ जरा भी अंदेशा गड़बड़ी होने क़ा है, वहां कोई क्यों जाएगा. झारखंड में ऐसा नहीं है कि कभी बड़ी फ़िल्में शूट नहीं हुई हैँ. अमिताभ बच्चन काला पत्थर की शूट के लिए गए थे, सत्यजीत रे भी गये हैं, लेकिन ये सभी अपने लेवल पर लोगों की मदद लेकर गए हैं, जब पॉलिटिकल विल होगी, तो ही बॉलीवुड की भीड़ वहां शूटिंग पर जाएगी, ऐसे कोई नहीं जाएगा. झारखंड क़ी कहानियां कहीं और शूट हो रही हैं ये अपने आप में बहुत बड़ा परिचायक है कि आपका अपना एसेट कोई और खिंचकर ले जा रहा है. झारखंड में खूबसूरत जगह है, लोकल टैलेंट भी भरकर है, लेकिन अर्जुन की आँख मिसिंग है. पॉलिटिकल विल नहीं की वहां इंडस्ट्री पनपे.प नप जो भी रहा है वो धीमा है, बेचारे लोकल लोग ही कुछ ना कुछ कर रहे हैं, लेकिन रीजनल फिल्मों का भी बिजनेस नहीं हैं.

रीजनल फिल्मों के ग्रोथ के लिए क्या स्टेप्स होने चाहिए ?

झारखंड के अलावा महाराष्ट्र, पंजाब, ओड़िसा, छत्तीसगढ़ उनका भी अपना फ़िल्म डेवलपमेंट बोर्ड है, जो अपनी फ़िल्म इंडस्ट्री को हर लेवल पर सपोर्ट करती हैं.फिल्मों के बनाने में सब्सिडी भी देती है. महाराष्ट्र की सबसे अच्छी बात है कि वह रीजनल फिल्मों को थिएटर में प्राइम टाइम स्लॉट देती है. आमतौर पर रीजनल फिल्मों को स्लॉट लोग नहीं देते हैँ, क्यूंकि बॉलीवुड की फिल्मों पर उनका झुकाव होता हैं. फ़िल्म दिखाने की गारंटी महाराष्ट्र सरकार देती हैं. उसके बाद फ़िल्म अगर नहीं चली, तो पूरी ज़िम्मेदारी मेकर्स की ही हो जाती हैं कि आपको स्लॉट तो पूरा मिला था, लेकिन आपकी फ़िल्म अच्छी नहीं थी, तो लोग देखने नहीं आए.तो महाराष्ट्र वाले लग कर सिनेमा बनाते हैँ, इसलिए उनका सिनेमा इतना अच्छा हैं. इस तरह क़ा सपोर्ट झारखंड सरकार को भी रीजनल सिनेमा को देना चाहिए. सिर्फ 50 प्रतिशत की सब्सिडी देने से जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती है. मेरे परिचित में ऐसे कई लोग हैं, जिनकी फ़िल्म बनकर तैयार हो गयी है, लेकिन वे अब तक रिलीज नहीं कर पाए हैं, क्यूंकि उन्हें थिएटर नहीं मिल रहे हैं.

झारखंड की फिल्म नीति में क्या बदलाव की जरूरत है?

2015 में फ़िल्म डेवलपमेंट बोर्ड जो बना था, उसकी नीतियाँ बेस्ट हैं, लेकिन उसे लागू करने क़ी ज़रूरत है.ये काम ही नहीं कर रहा है. अगर कर भी रहा तो पता नहीं कैसे कर रहा है , उसमें पारदर्शिता क़ी कमी है. अगर लोग वहां जाएंगे, तो क्यों जाएंगे. आप दूसरी भाषा क़ी फिल्मों को 25 प्रतिशत सब्सिडी दे रहे हैं, लेकिन आप सिर्फ पेपर पर लिखे हो उसको भी दे नहीं रहे हो, तो आदमी वहां क्यों जाएगा. कोंकना सेन शर्मा की डेथ इन गूँज झारखंड में शूट हुई बेहतरीन फिल्मों में से है. उस फ़िल्म के निर्माता मेरे परिचित हैं, उन्होंने बताया कि उन्हें सब्सिडी नहीं मिली, आप पेपर पर लिखकर भी नहीं दे रहे हो.इससे अच्छा आदमी सोचता है कि इस कहानी को भोपाल में सेट कर देते हैं, वहां आराम से सब्सिडी मिल जाती है.यूपी में डाल देंगे कहानी को, कितना फर्क ही है संस्कृति में. मेरे एक दोस्त की फ़िल्म है. पूरी कहानी झारखंड की है, लेकिन शूट छत्तीसगढ़ में होगी अगले महीने से,क्यूंकि वहां सब्सिडी आराम से मिल गयी है.यहाँ पर ऑनलाइन अप्लाई करने के बाद कुछ गतिविधि क़ा पता ही नहीं होता है.

पॉलिटिकल विल के अलावा और किन पहलुओं पर काम करने की जरूरत है ताकि मेनस्ट्रीम सिनेमा फिल्म निर्माण के लिए झारखंड की ओर रुख करें?

2018 में हुए झारखंड फ़िल्म फेस्टिवल्स की चर्चा मुम्बई तक हुई थी, लेकिन उसके बाद मामला ठंडा पड़ गया. एक बार आदमी अपने से पैसे लगाकर या उधार लेकर कर देगा, लेकिन बार -बार ये नहीं होगा. सरकार को फ़िल्म फेस्टिवल को अपने अधिकार में लेना होगा. सरकार के जुड़ने से एक विश्वास जगता है. उसमें जो अवॉर्ड मिलेगा, उसकी एक पहचान होगी. इससे अच्छे लोग जुड़ेंगे, सिर्फ राज्यों के ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों से भी लोग आएंगे. लोग बाहर से आएंगे, तो सिर्फ फ़िल्म फेस्टिवल ही नहीं आसपास की जगह भी देखेंगे. जिससे उनके दिमाग़ में भी स्टोरी आएगी या शूट करने का प्लान आएगा.लोकल सपोर्ट के बारे में मालूम होगा. ये जो आना -जाना होता है, ये फेस्टिवल के बहाने ही होता है. फ़िल्म फेस्टिवल्स के बहाने हम खो रही साख को फिर से पा सकते हैं.

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Author: कोरी

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