फिल्म- हैवान
डायरेक्टर: प्रियदर्शन
कास्ट: सैफ अली खान, अक्षय कुमार, बोमन ईरानी, श्रिया पिलगांवकर, सैयामी खेर, मोहनलाल, असरानी, शारिब हाशमी, पहल चौधरी
समय: 2 घंटे 44 मिनट
रेटिंग: 4
एक अच्छी थ्रिलर की असली ताकत उसके ट्विस्ट से ज्यादा उस तनाव में होती है, जो कहानी के साथ लगातार बढ़ता जाता है. प्रियदर्शन की 'हैवान' इसी तनाव को अपनी कहानी का आधार बनाती है. फिल्म एक खतरनाक और रहस्यमयी आदमी परशुराम और श्याम के बीच टकराव की कहानी है, जो देख नहीं सकता, लेकिन अपनी समझ और हिम्मत के दम पर मुश्किल हालात का सामना करता है. दोनों किरदार एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं और यही फर्क फिल्म को उसका सबसे दिलचस्प पहलू देता है.
विलेन बनकर अक्षय कुमार ने लूटी लाइमलाइट
अक्षय कुमार ने परशुराम के किरदार में अपने करियर की सबसे अलग परफॉर्मेंस में से एक दी है. यह ऐसा विलेन नहीं है जिसे डर पैदा करने के लिए हर वक्त ऊंची आवाज या बड़े-बड़े डायलॉग की जरूरत पड़ती है. परशुराम जितना शांत दिखाई देता है, उतना ही खतरनाक महसूस होता है. अक्षय अपनी बॉडी लैंग्वेज, एक्सप्रेशन और आवाज के बेहद नियंत्रित इस्तेमाल से किरदार में एक अजीब-सी बेचैनी पैदा करते हैं. आपको कभी पूरी तरह समझ नहीं आता कि वह अगला कदम क्या उठाने वाला है. यही अनिश्चितता परशुराम को प्रभावी बनाती है और अक्षय को इस किरदार में देखने का अनुभव खास हो जाता है.
सैफ अली खान की परफॉर्मेंस है जबरदस्त
सैफ अली खान का श्याम इसके बिल्कुल विपरीत है. वह शारीरिक रूप से कमजोर स्थिति में है, लेकिन फिल्म उसे कभी बेबस नहीं बनाती. सैफ भी इसी बात को अपनी परफॉर्मेंस में पकड़ते हैं. वह श्याम के अंधेपन को जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाने के बजाय उसके आत्मविश्वास और समझदारी पर ध्यान देते हैं. खतरा बढ़ने के साथ श्याम को अपनी बाकी इंद्रियों और अपने दिमाग पर भरोसा करना पड़ता है. सैफ इस संघर्ष को बहुत सहजता से निभाते हैं. उनके अभिनय में एक ठहराव है, जो किरदार को विश्वसनीय बनाता है.
क्या है हैवान फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी अक्षय और सैफ के बीच का टकराव है. दोनों के बीच होने वाले सीन सिर्फ एक्शन तक सीमित नहीं रहते. उनमें लगातार एक मानसिक खेल चलता रहता है. परशुराम अपनी ताकत और आत्मविश्वास के दम पर परिस्थितियों को नियंत्रित करना चाहता है, जबकि श्याम हर स्थिति को समझकर अपनी अगली चाल तय करता है. यही अंतर दोनों के बीच तनाव पैदा करता है. दर्शक सिर्फ यह जानने के लिए उत्सुक नहीं रहते कि कौन जीतेगा, बल्कि यह भी जानना चाहते हैं कि कौन पहले दूसरे की चाल समझ पाएगा. फिल्म के सबसे रोमांचक पल इसी मुकाबले से निकलते हैं.
फिल्म में हमें पहल चौधरी भी दिखाई देती है, उनकी परफॉरमेंस काफी सरप्राइज़िन्ग्ग है. बड़े सितारों से सजी कहानी में उनका किरदार आसानी से पीछे छूट सकता था, लेकिन उनकी परफॉर्मेंस उसे ऐसा नहीं होने देती. वह अपने किरदार में सहजता और भावनात्मक सच्चाई लेकर आती हैं. उनकी मौजूदगी कहानी में इमोशनल बैलेंस लेकर आती है.
सपोर्टिंग कास्ट भी फिल्म की दुनिया को मजबूती बनाती है. बोमन ईरानी, सैयामी खेर और श्रिया पिलगांवकर अपने-अपने किरदारों में भरोसा पैदा करते हैं. शारिब हाशमी पुलिस अधिकारी के रूप में कहानी को स्वाभाविक बनाए रखते हैं. वहीं असरानी की मौजूदगी फिल्म के भावनात्मक पक्ष को मजबूत करती है. उन्हें पर्दे पर देखना अपने आप में खास है और उनकी आखिरी ऑन-स्क्रीन मौजूदगी होने की वजह से उनके सीन और भी ज्यादा दिल छूते हैं.
हैवान का कैसा है स्क्रीनप्ले
प्रियदर्शन का अनुभवी डायरेक्टर है, यह उनकी 98वीं फिल्म है, और वह जानते हैं कि सस्पेंस को कब बढ़ाना है और कब किरदारों को कहानी संभालने देनी है. 2 घंटे 44 मिनट का रनटाइम जरूर लंबा है, लेकिन फिल्म अधिकांश समय अपनी गति बनाए रखती है. स्क्रीनप्ले अपने मुख्य संघर्ष से भटकता नहीं और इसी वजह से कहानी में एक निरंतरता बनी रहती है.
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर भी शानदार है, जो टेंस माहौल को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. खासकर अक्षय और सैफ के बीच एक्शन सीन्स में संगीत सस्पेंस को और मजबूत करता है, लेकिन कलाकारों की परफॉर्मेंस पर हावी नहीं होता. प्रीतम का संगीत भी कहानी के साथ सहजता से चलता है.
फाइनल वर्डिक्ट
कुल मिलाकर, 'हैवान' की सबसे बड़ी ताकत इसके कलाकार और उनके बीच का टकराव है. अक्षय कुमार और सैफ अली खान ने अपनी परफॉरमेंस से फिल्म को बांधे रखा है. हैवान का शानदार थ्रिलर है, जिसे बड़े पर्दे पर देखना चाहिए.
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