फिल्म – मिर्ज़िया
निर्माता और निर्देशक -राकेश ओम प्रकाश मेहरा
कलाकार-हर्षवर्धन कपूर ,सैयामी खेर ,अनुज ,अंजलि ,अनुपम खेर और अन्य
संगीतकार-शंकर,एहसान, लॉय
रेटिंग -दो
दिल्ली-6 ,रंग दे बसन्ती ,भाग मिल्खा भाग जैसी फिल्में बना चुके फिल्मकार राकेश ओम प्रकाश मेहरा इस बार प्रेम कहानी को रुपहले परदे के लिए चुना है. सदियों पुरानी प्रेमकहानी साहिबा और मिर्ज़ा की. राकेश की पिछली फिल्म रंग दे बसंती की तरह यहां भी कहानी को कहने का अंदाज़ अतीत और वर्तमान को साथ साथ लिए चलता है. एक है सदियों पुरानी साहिबा और मिर्ज़ा की कहानी और दूसरी कहानी राजस्थान की पृष्ठभूमि पर नए दौर के प्रेमियों मोहनीश (हर्षवर्धन कपूर) और सुचित्रा (सैयामी खेर) की. कहानी में सदियों का अंतर है लेकिन प्यार वही है. प्रेम पर परिवार और समाज की सोच दशकों बाद भी नहीं बदली है. यह इस फिल्म में भी दिखाया गया है.
मोहनीश और सुचित्रा बचपन से एकदूसरे से प्यार करते हैं. दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते हैं. एक दिन स्कूल का मास्टर होमवर्क ना करने पर सुचित्रा को मारता है जिसके बाद मोहनीश टीचर का खून कर देता है और वह बाल सुधार गृह भेज दिया जाता है. दोनों अलग-अलग परिवेश में बड़े होते हैं और एक बार फिर मिलते हैं लेकिन जब मिलते हैं तब सुचित्रा की शादी किसी और से तय हो चुकी होती है. क्या सुचित्रा अपने प्यार को पहचान पाएगी? क्या होगा इस प्रेम कहानी का हश्र?
फिल्म में बार-बार फ्लैशबैक में मिर्ज़ा और साहिबान की प्रेमकहानी भी इस लव स्टोरी के साथ दिखाई जाती है. दोनों में सदियों का फासला होने के बावजूद समानता है. फिल्म की कमजोर कड़ी इसकी कहानी है. रंग दे बसंती में भी राकेश ने दो कहानियों को एक ही समय पर दिखाया था जो कि एकदम सटीक बैठी थी. लेकिन इस बार वो बात नजर नहीं आती है. फिल्म की कहानी गुलज़ार ने लिखी है. वह सालों बाद किसी फिल्म के स्क्रीनप्ले से जुड़े है. स्क्रीनप्ले और बेहतर हो सकता था यह बात फिल्म को देखते हुए कई बार महसूस होती है. यह कहना गलत न होगा कि. कहानी एक वक्त के बाद बोर करने लगती है. फिल्म की रफ़्तार भी बहुत धीमी है. कहानी को कहने के लिए दृश्यों के संयोजन भी प्रभावी नहीं है. करन का किरदार जब मोहनीश को मारता है. वह दृश्य अधूरा सा लगता है क्या कैसे हुआ समझ नहीं आता.
फिल्म की खूबी इसका लुक है. फिल्म को एक खूबसूरत कविता की तरह प्रस्तुत किया गया है. लदाख के खूबसूरत पहाड़ हो या राजस्थान का राजसी और लोकपरंपरा का गाढ़ा रंग फिल्म की कहानी में बहुत खूबसूरत ढंग से मिलाया गया है. फिल्म में आग भी कई बार दृश्यों की खूबसूरती को बढ़ा जाती है. अभिनय की बात करे तो किरदारों की मेहनत परदे पर नज़र आती है फिर चाहे घुड़सवारी हो या गोल्फ के मैच या फिर तीरंदाज़ी लेकिन अभिनय के दूसरे मापदंडों पर वह खरे नहीं उतरते हैं. खासकर संवाद अदाएगी में. यूं तो फिल्म में ज़्यादा संवाद नहीं लेकिन जितने भी मिले हैं हर्षवर्धन और सैयामी दोनों इस में चूकते नज़र आये हैं. हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह दोनों कलाकार रेगुलर बॉलीवुड के कलाकारों से अलग नज़र आये हैं.
हर्षवर्धन का लुक टिपिकल बॉलीवुड वाला नहीं है. वह परदे पर आकर्षक दिखने के बजाय हमेशा अपने किरदार के करीब दिखे हैं इस बात के लिए उनकी तारीफ करनी होगी. तीसरे न्यूकमर अनुज ने अपने किरदार में एक राजकुमार के औरा को बखूबी पेश किया है. अंजलि और बाकि के किरदार अपनी अपनी भूमिका में सटीक रहे हैं. अभिनेता ओम पुरी को करने के लिए फिल्म में कुछ ख़ास नहीं था. हां फिल्म की शुरुवात में बोला गया उनका संवाद खास बन पड़ा है हालांकि बस यही एक संवाद फिल्म का ख़ास है. फिल्म में संवादों की कमी महसूस होती है.
साहिबा और मिर्ज़ा की कहानी में संवाद का उपयोग नहीं किया गया है. सिर्फ संगीत के ज़रिये प्रस्तुति हुई है. फिल्म की प्रस्तुति काव्यात्मक है इसलिए संगीत इस फिल्म में सबसे अहम है. संगीत की बात करे तो शंकर एहसान लॉय का संगीत बहुत उम्दा है वह फिल्म की रिलीज़ से पहले ही चर्चा का विषय थे लेकिन फिल्म देखते हुए आप महसूस करोगे कि संगीत उस में रचे बसे नहीं हैं कई बार दलेर मेहँदी की अचानक से आयी आवाज़ कहानी से ध्यान हटा देती है. संगीत में पंजाबी शब्दों को जमकर इस्तेमाल हुआ है. कुलमिलाकर प्रयोगधर्मी राकेश ओम प्रकाश मेहरा इस बार अपने प्रयोगों में अधिकता कर दी है जिस वजह से उनकी यह काव्यात्मक पेशकश मिर्ज़िया प्रभावित नहीं कर पायी है.
!!उर्मिला कोरी!!
