akshay kumar :अक्षय कुमार स्टारर फिल्म “वेलकम टू जंगल” सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है.इस मल्टीस्टारर फिल्म से निर्माता के तैर पर भी अक्षय का नाम जुड़ा हुआ है. उनकी इस फिल्म और करियर पर उर्मिला कोरी से हुई बातचीत
इस फिल्म में आप भोजपुरी गाने पर डांस करते नज़र आ रहे हैं, एक वक़्त था जब भोजपुरी गीत हो या एक्टर्स उनको कमतर समझा जाता था ?
मैं अपनी बात करूं मुझे याद नहीं कि मैंने कभी किसी एक्टर को कमतर समझा है, और न ही मैं ऐसा करने का समर्थन करता हूँ. आखिरकार, एक्टर तो एक्टर ही होता है, चाहे वह भोजपुरी, हिंदी या गुजराती सिनेमा में काम करे. हमारी फ़िल्म में एक लाइन भी है कि “भोजपुरी, हॉलीवुड से बेहतर है.”मैंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मैं सच में ऐसा मानता था. मुझे फ़िल्म के भोजपुरी गाने पर काम करने में बहुत मज़ा आया. इसकी शूटिंग सिर्फ़ एक दिन में पूरी हो गई थी. गणेश आचार्य ने इसकी कोरियोग्राफ़ी की थी. उस समय मुझे 102 डिग्री बुखार था, फिर भी मैंने शूटिंग का भरपूर मज़ा लिया.
सलमान ने एक बार कहा था कि आप लोगों के दौर में सभी ने कई मल्टी-स्टारर फ़िल्में कीं, लेकिन नई पीढ़ी मल्टी-स्टारर फ़िल्मों के साथ एक्सपेरिमेंट करने से डरती है?
यह असुरक्षा की बात नहीं है. हर किसी की अपनी सोच होती है; उन्हें लगता है कि उन्होंने जो फ़ैसला किया है वह सही है, और हमें लगता है कि हम जो कर रहे हैं वह सही है. मुझे लगता है कि हमें हर तरह की चीज़ें आज़मानी चाहिए, लेकिन हो सकता है कि उनकी सोच वैसी न हो. ऐसा कोई तय फ़ॉर्मूला नहीं है कि मल्टी-स्टारर फ़िल्में ही चलेंगी या सोलो लीड वाली फ़िल्में बेहतर करेंगी. किसी भी फ़िल्म के लिए कोई पक्का हिट फ़ॉर्मूला नहीं होता.
टिकट खिड़की पर इनदिनों फिल्में नहीं चल रही हैं, फिल्म की सफलता के लिए आप सबसे अहम क्या मानते हैं ?
बजट को सबसे अहम मानता हूँ. कभी-कभी फ़िल्म बनाते समय फ़िल्ममेकर्स का बजट बिगड़ जाता है. मुझे प्रोड्यूसर-डायरेक्टर यश चोपड़ा के साथ काम करने का मौका मिला है. ज़िंदगी में उनका एक उसूल था. वे हमेशा मुझसे पंजाबी में कहते थे कि अगर फ़िल्म का बजट सही है, तो फ़िल्म अपने आप हिट हो जाएगी. फ़िल्में बनाने के लिए यही उनका मंत्र था. कभी-कभी डायरेक्टर और राइटर से गलती हो सकती है, लेकिन सही बजट की वजह से फ़िल्म को बचाया जा सकता है. इसलिए अगर आपने मेरी फ़िल्में देखी हों, तो वे हमेशा सही बजट में बनी हैं. मैं यह पक्का करता हूँ कि मेरी फ़िल्मों के प्रोड्यूसर को नुकसान न हो.
आपको क्या लगता है कि फ़िल्म बनाते समय एक्टर्स का प्रोड्यूसर को सपोर्ट भी अहम है ?
हां ,यह ज़रूरी है कि साथ काम करते समय प्रोड्यूसर, एक्टर और डायरेक्टर एक-दूसरे को समझें. मैं नहीं चाहता था कि प्रोड्यूसर पर बोझ पड़े, इसलिए मैंने उनसे इस फिल्म के लिए एक पैसा भी नहीं लिया. मैं इस फ़िल्म में सिर्फ़ एक इन्वेस्टर रहा हूँ. फ़िल्म में बहुत सारे एक्टर्स हैं फिर भी इसे 115 करोड़ के बजट में बनाया है. फ़िल्म में हर दिन 24 एक्टर्स साथ में शूटिंग करते थे.इसके बावजूद इस बजट में फिल्म पूरी हो गयी है.जो बताता है कि सभी ने सपोर्ट किया है.
फिल्में जब नहीं चलती हैं तो आप किस तरह से उससे डील करते हैं ?
यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है. हम यहाँ काम करने और उसे पूरा करने आते हैं, मैं ज़्यादा सोचता नहीं हूँ. जब कोई फ़िल्म फ़्लॉप हो जाती है, तो आप कुछ नहीं कर सकते हैं. ज़्यादा से ज़्यादा आप यह समझने की कोशिश कर सकते हैं कि वह क्यों फ़्लॉप हुई, और अगली बार वही गलती न दोहराने की कोशिश कर सकते हैं. हर किसी की ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आते हैं. आपको यह समझना होगा और आगे बढ़ते रहना होगा. एक पुरानी कहावत है कि जब तूफ़ान आए तो सिर झुकाकर रखना चाहिए. तूफ़ान गुज़रने के बाद भी सिर झुकाकर रखना ही आपके और आपकी सुरक्षित ज़िंदगी के लिए बेहतर होता है. मैं भी यही करता हूँ.
पिछले 36 सालों से आप इंडस्ट्री में सक्रिय है ,अब आपके लिए मोटिवेशन क्या रहता है ?
मैं पिछले 36 सालों से ऐसा ही कर रहा हूँ और यह मेरे स्वभाव में शामिल हो गया है। यह एक ऐसी आदत है जिसे मैंने अपनाया है. सुबह उठना और काम पर निकल जाना. मैंने अपने पिता को सालों तक ऐसा करते देखा है. वे जल्दी उठते थे, काम पर जाते थे और शाम को घर लौटते थे. इसलिए मैंने हमेशा उनकी तरह बनने और उनके तौर-तरीकों को अपनाने की कोशिश की है. इसी तरह मैं साल में चार फ़िल्में कर पाता हूँ.
आपकी पहली फ्रेंचाइजी में से एक खिलाड़ी थी क्या उस पर कोई फिल्म बनाने की योजना है ?
हां, मैं ‘खिलाड़ी’ फ़्रैंचाइज़ी की फ़िल्म करना चाहता हूँ लेकिन वह आखिरी होगी. उसका टाइटल भी ‘आखिरी खिलाड़ी’ होगा. मुझे बस एक अच्छी स्क्रिप्ट की तलाश है.
