WEF Economic Growth Report: दुनिया की अर्थव्यवस्था अब एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की नई रिपोर्ट “ग्रोथ इन द न्यू इकोनॉमी: टुवर्ड्स अ ब्लूप्रिंट” के मुताबिक, आने वाले समय में दुनिया की तरक्की का इंजन अमीर देश नहीं, बल्कि मिडिल-इनकम वाले देश (जैसे भारत और वियतनाम) होंगे.
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2030 तक दुनिया की कुल जीडीपी ग्रोथ में लगभग दो-तिहाई हिस्सा इन्हीं मध्यम आय वाले देशों का होगा. इसमें भी आधी से ज्यादा ग्रोथ अकेले एशिया से आने की उम्मीद है.
क्या पुरानी नीतियां अब काम नहीं आएंगी?
आज की दुनिया एआई (AI), बढ़ते कर्ज और जलवायु परिवर्तन जैसी नई चुनौतियों से जूझ रही है. रिपोर्ट कहती है कि अब पुराने आर्थिक मॉडल कमजोर पड़ रहे हैं. अब तरक्की के लिए सिर्फ फैक्ट्रियां लगाना काफी नहीं है, बल्कि सरकारों को तकनीक और लोगों के कौशल (Skill) पर निवेश करना होगा. आने वाले समय में आईटी सर्विस, हेल्थकेयर और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर सबसे ज्यादा नौकरियां और पैसा पैदा करेंगे.
क्या ग्लोबल सहयोग से बढ़ेगी देश की ताकत?
WEF के अनुसार, सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाने की है. देशों को यह तय करना होगा कि वे पूरी तरह आत्मनिर्भर बनें या दुनिया के साथ मिलकर चलें. जहां अमीर देशों में लेबर की कमी और कड़े नियम बड़ी बाधा हैं, वहीं गरीब देशों के सामने बुनियादी ढांचे (Infrastructure) और निवेश की कमी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है. रिपोर्ट के अनुसार, अगले 5 सालों में प्राइवेट कंपनियों का निवेश ही विकास की असली चाबी होगा, क्योंकि सरकारों पर कर्ज का बोझ बहुत ज्यादा बढ़ चुका है.
क्या बढ़ती उम्र और पर्यावरण तरक्की को रोकेंगे?
बदलते दौर में जनसंख्या और मौसम भी बड़ा रोल निभाएंगे. यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों में आबादी बूढ़ी हो रही है, जिससे वहां विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है. इसके उलट, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के युवाओं की फौज आर्थिक तरक्की को नई उड़ान दे सकती है. साथ ही, ‘ग्रीन एनर्जी’ (Eco-friendly energy) पर शिफ्ट होना अब मजबूरी और मौका दोनों है. हालांकि, इसमें शुरुआती खर्च ज्यादा है, लेकिन भविष्य की मजबूती के लिए यह बेहद जरूरी है.
यह रिपोर्ट करीब 118 देशों के 11,000 से ज्यादा दिग्गजों की राय पर आधारित है. साफ है कि भविष्य उन्हीं का है जो तकनीक को अपनाएंगे, अपने युवाओं को हुनरमंद बनाएंगे और पर्यावरण के साथ तालमेल बिठाकर चलेंगे. मिडिल-इनकम देश अब ग्लोबल लीडर बनने की रेस में सबसे आगे हैं.
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