SBI Research Report : भारतीय स्टेट बैंक के आर्थिक अनुसंधान विभाग (SBI Research) ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में आ रही लगातार गिरावट को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से बाजार में मजबूती से हस्तक्षेप (Intervention) करने की मांग की है.
एसबीआई रिसर्च का तर्क है कि रुपये की मौजूदा गिरावट देश के मजबूत आर्थिक आधार (Economic Fundamentals) के बिल्कुल विपरीत और अत्यधिक है. पोर्ट में साफ कहा गया है कि डॉलर के मुकाबले रुपये के गिरने की रफ्तार असामान्य रूप से बहुत तेज रही है, जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था के व्यापक आर्थिक संकेतक (Macroeconomic Indicators) अभी भी काफी मजबूत स्थिति में हैं.
“152 दिनों में ₹5 टूटा रुपया”
एसबीआई रिसर्च ने रुपये की कमजोरी के पैटर्न पर एक चौंकाने वाला आंकड़ा पेश किया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, “रुपये की गिरावट की रफ्तार काफी लापरवाह (Reckless) रही है. रुपये को डॉलर के मुकाबले ₹90 से ₹95 तक पहुंचने में (यानी ₹5 की गिरावट में) महज 152 दिन का समय लगा.”
ध्यान रहे कि इसी गिरावट के सिलसिले के बीच 20 मई, 2026 को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.83 के रिकॉर्ड निचले स्तर को छू गया था. एसबीआई के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि दुनिया की अन्य प्रमुख करेंसी की तुलना में डॉलर की मजबूती के सामने भारतीय रुपया जरूरत से ज्यादा कमजोर हुआ है, जिसकी जरूरत देश के मौजूदा आर्थिक हालातों को देखते हुए नहीं थी.
डॉलर बचाने के लिए RBI के पास पर्याप्त ‘हथियार’
क्या रिजर्व बैंक के पास रुपये को संभालने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) है? इस पर एसबीआई रिसर्च ने सकारात्मक रुख अपनाया है.
- मजबूत फॉरेक्स रिजर्व: रिपोर्ट के अनुसार, “रुपये की एकतरफा गिरावट को रोकने के लिए भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह से पर्याप्त (Optimally Sufficient) है.”
- ₹47 अरब डॉलर की कमी लेकिन चिंता नहीं: हालांकि 27 फरवरी, 2026 के बाद से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में करीब 47 अरब अमेरिकी डॉलर ($47 Billion) की गिरावट आई है, लेकिन इसके बावजूद देश का कुल विदेशी मुद्रा भंडार अभी भी 680 अरब डॉलर ($680 Billion) के आसपास बना हुआ है.
- यह विशाल रिजर्व केंद्रीय बैंक (RBI) को बाजार में उतरने और बड़े पैमाने पर डॉलर बेचकर रुपये को स्थिरता देने के लिए पर्याप्त जगह (Room) देता है.
रुपये के टूटने की असली वजह क्या है?
एसबीआई रिसर्च की टीम ने साफ किया है कि रुपये की इस ऐतिहासिक कमजोरी के पीछे केवल वैश्विक स्तर पर डॉलर का मजबूत होना ही एकमात्र कारण नहीं है, बल्कि इसके पीछे दो और बड़े विलेन हैं.
- पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) का संकट: पश्चिम एशिया में लगातार जारी संघर्ष के चलते दुनिया भर के निवेशकों में जोखिम न लेने की भावना (Risk Aversion) बढ़ी है.
- विदेशी फंड्स की महा-बिकवाली: इस युद्ध के शुरू होने के बाद से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI/FII) ने भारतीय शेयर बाजार से बड़े पैमाने पर पैसा निकाला है. आंकड़ों के मुताबिक, पश्चिम एशिया संकट की शुरुआत से अब तक विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय इक्विटी बाजार से 22.7 अरब डॉलर ($22.7 Billion) बाहर ले जा चुके हैं.
आगामी RBI पॉलिसी: ब्याज दरों पर क्या होगा फैसला?
आने वाले दिनों में होने वाली आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक को लेकर एसबीआई रिसर्च ने अनुमान जताया है कि कच्चे तेल (Crude Oil) की बढ़ती कीमतों, ईंधन के दामों में बढ़ोतरी और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण महंगाई का जोखिम (Inflation Risk) बढ़ रहा है. इसे देखते हुए RBI ब्याज दरों (Policy Rates) में कोई बदलाव नहीं करेगा यानी स्टेटस को (Status Quo) बनाए रखेगा.
हालांकि, नीति दरों को स्थिर रखते हुए भी आरबीआई को अपने अन्य वित्तीय टूल्स का इस्तेमाल करके करेंसी मार्केट की इस अत्यधिक अस्थिरता को तुरंत शांत करना चाहिए.
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