Rupee Vs Dollar: भारतीय रुपये के लिए यह सप्ताह चुनौतियों भरा रहने वाला है. अमेरिका-ईरान राजनयिक प्रयासों की विफलता और फारस की खाड़ी में नौसैनिक नाकेबंदी (Naval Blockade) ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाली तेल आपूर्ति ठप होने का डर पैदा कर दिया है. इसके चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतें $102 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं.
चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर है, इसलिए कच्चे तेल में $10 का हर उछाल देश के चालू खाता घाटे (CAD) को सालाना लगभग $15 बिलियन बढ़ा सकता है.
भारी उतार-चढ़ाव और ग्लोबल प्रेशर
पिछले सप्ताह रुपये में जबरदस्त अस्थिरता (Volatility) देखी गई. यह ₹95.23 के अपने रिकॉर्ड निचले स्तर को छूने के बाद सुधार के साथ ₹92.40 तक आया था, लेकिन संघर्ष बढ़ने के साथ यह फिर से ₹93.30 के स्तर पर कमजोर हो गया है. इसके अलावा, सुरक्षित निवेश (Safe-haven demand) के रूप में अमेरिकी डॉलर की बढ़ती मांग और बढ़ते बॉन्ड यील्ड ने उभरते बाजारों की मुद्राओं, विशेषकर रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है.
विदेशी निवेशकों की निकासी
एक तरफ जहां कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं. फरवरी 2026 से अब तक $20 बिलियन से अधिक की निकासी हो चुकी है. हालांकि, राहत की बात यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास $697.1 बिलियन का विशाल विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) मौजूद है. यह भंडार रुपये में होने वाली किसी भी अनियंत्रित गिरावट को रोकने के लिए एक ‘डिफेंसिव कुशन’ का काम करेगा.
आयातित महंगाई और CAD का बढ़ता जोखिम
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें न केवल रुपये को कमजोर कर रही हैं, बल्कि ‘आयातित महंगाई’ (Imported Inflation) का खतरा भी बढ़ा रही हैं. इससे देश के व्यापार संतुलन पर बुरा असर पड़ता है. रिपोर्ट के अनुसार, जब तक ब्रेंट क्रूड की कीमतें स्थिर नहीं होतीं या पश्चिम एशिया में शांति की कोई ठोस उम्मीद नहीं दिखती, तब तक रुपये का रुझान कमजोर (Bearish) बना रहेगा.
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