Emkay Research Report: एमके रिसर्च की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस समय एक बेहद जटिल स्थिति में है. ईरान संकट और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने एक ऐसा ‘एनर्जी शॉक’ पैदा किया है, जिससे निपटना आसान नहीं है. रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि आरबीआई के पास इस स्थिति से निपटने का कोई सीधा रास्ता नहीं है, क्योंकि उसे एक साथ कई मोर्चों, महंगाई, आर्थिक विकास (Growth), लिक्विडिटी और रुपये की स्थिरता पर कठिन तालमेल बिठाना होगा.
महंगाई और ग्रोथ का कठिन संतुलन
आमतौर पर जब महंगाई बढ़ती है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ा देता है, लेकिन मौजूदा संकट ‘सप्लाई-ड्रिवन’ (आपूर्ति में बाधा) होने के कारण यह निर्णय चुनौतीपूर्ण है. अगर आरबीआई ब्याज दरें बढ़ाता है, तो कर्ज महंगा होगा और आर्थिक विकास (GDP) की रफ्तार धीमी हो सकती है.
हालांकि ईंधन की कीमतों का सीधा असर अभी प्रबंधित मूल्य निर्धारण के कारण सीमित दिख रहा है, लेकिन इसके ‘सेकंड-राउंड इफेक्ट’ (जैसे माल ढुलाई महंगी होने से अन्य वस्तुओं के दाम बढ़ना) का जोखिम अब काफी बढ़ गया है.
रुपये को बचाने की पुरजोर कोशिश
भारतीय रुपया इस समय बाहरी दबावों के कारण भारी तनाव में है और आरबीआई लगातार विदेशी मुद्रा भंडार के जरिए हस्तक्षेप कर रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, रुपया बचाने के लिए आरबीआई मुख्य रूप से ‘फॉरवर्ड मार्केट्स’ का सहारा ले रहा है, जिससे मुद्रा को कुछ स्थिरता तो मिली है लेकिन बाजार में नकदी (Liquidity) को कम करने की प्रक्रिया में देरी हुई है. फिलहाल रुपये की रक्षा के लिए ब्याज दरों में किसी बड़े या अचानक इजाफे की संभावना कम ही नजर आ रही है.
FY27 के लिए आर्थिक अनुमानों में बदलाव
ईरान संघर्ष के कारण ऊर्जा आपूर्ति में लंबे समय तक होने वाली बाधा को देखते हुए एमके रिसर्च ने अगले वित्त वर्ष (FY27) के लिए अपने बुनियादी आर्थिक अनुमानों को संशोधित किया है. रिपोर्ट में कच्चे तेल की औसत कीमत $80 प्रति बैरल रहने का अनुमान लगाया गया है, जिसके परिणामस्वरूप वित्त वर्ष 2027 के लिए जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को 0.4% घटाकर 6.6% कर दिया गया है. वहीं, महंगाई दर के बढ़कर 4.3% होने और करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) के जीडीपी के 1.7% तक पहुंचने की आशंका जताई गई है.
बोझ का बंटवारा (The Burden Sharing)
रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है कि ऊर्जा संकट का अंतिम आर्थिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल की बढ़ती कीमतों का वित्तीय बोझ समाज के विभिन्न वर्गों के बीच कैसे बांटा जाता है. यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तेल विपणन कंपनियां कितना घाटा सहती हैं, सरकार टैक्स (Excise Duty) में कितनी कटौती करती है और अंततः उपभोक्ताओं पर कितना बोझ डाला जाता है. आरबीआई का भविष्य का नीतिगत रास्ता इन बाहरी जोखिमों और विकास-महंगाई के बीच संतुलन साधने की उसकी क्षमता पर टिका होगा.
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