आरटीआई को लेकर आरबीआई और बैंक आमने-सामने, सूचना देने पर मचा घमासान

RTI Controversy: आरटीआई के तहत बैंकिंग सूचनाओं के खुलासे को लेकर आरबीआई और देश के बड़े बैंक आमने-सामने आ गए हैं. एनपीए सूची, डिफॉल्टरों के नाम, निरीक्षण रिपोर्ट और जुर्माने से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने पर विवाद खड़ा हो गया है. बैंक इसे व्यावसायिक हितों के खिलाफ बता रहे हैं, जबकि आरबीआई पारदर्शिता पर जोर दे रहा है. यह मामला सीआईसी की बड़ी पीठ के पास भेजा गया है.

By KumarVishwat Sen | January 11, 2026 7:41 PM

RTI Controversy: सूचना अधिकार कानून (आरटीआई) के तहत सूचना के देने के मामले में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और देश के बैंक आमने-सामने हो गए हैं. आरटीआई के जरिए आवेदकों को सूचना मुहैया कराने के नाम पर केंद्रीय बैंक और देश के बैंकों में घमासान मचा हुआ है. आरबीआई का कहना है कि आवेदकों को डिफॉल्टरों और एनपीए की सूची, जुर्माने और निरीक्षण रिपोर्ट जैसी सूचनाएं सार्वजनिक की जानी चाहिए. लेकिन बैंक इस पर आपत्ति जता रहे हैं. इसके विरोध में बैंक ऑफ बड़ौदा, आरबीएल बैंक, यस बैंक और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) से संपर्क भी साधा है.

बैंकों का क्या है तर्क

सीआईसी से संपर्क साधकर बैंकों ने कहा है कि यदि एनपीए, डिफॉल्टरों की सूची, जुर्माने और निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक की जाती हैं, तो इससे उनकी कारोबारी रणनीति, ग्राहकों का भरोसा और प्रतिस्पर्धी स्थिति प्रभावित हो सकती है. बैंकों का तर्क है कि इस तरह की नियामक जानकारी फिड्यूशियरी कैपेसिटी में दी जाती है, जिसे बिना सोचे-समझे सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए.

किन-किन जानकारियों पर पैदा हुआ विवाद

आरटीआई आवेदनकर्ता धीरज मिश्रा, वथिराज, गिरीश मित्तल और राधा रामन तिवारी ने आरबीआई से अलग-अलग आरटीआई आवेदन दायर कर कई अहम जानकारियां मांगी थीं. इनमें यस बैंक के टॉप 100 एनपीए और जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों की सूची, एसबीआई और आरबीएल बैंक की निरीक्षण रिपोर्ट और बैंक ऑफ बड़ौदा पर वैधानिक निरीक्षण के बाद लगाए गए 4.34 करोड़ रुपये के मौद्रिक जुर्माने से जुड़े दस्तावेज शामिल हैं. आरबीआई ने प्रारंभिक तौर पर इन सूचनाओं को आरटीआई अधिनियम के तहत सार्वजनिक किए जाने योग्य माना.

आरबीआई का रुख साफ, आरटीआई सबसे ऊपर

भारतीय रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया है कि आरटीआई अधिनियम, 2005 सभी पुराने कानूनों पर वरीयता रखता है और इसका मूल उद्देश्य पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित करना है. आरबीआई ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही डिफॉल्टरों की सूची और निरीक्षण रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के पक्ष में कई बार फैसला दे चुका है. केंद्रीय बैंक का कहना है कि अगर बैंकिंग व्यवस्था पर जनता का भरोसा बनाए रखना है, तो एनपीए, जुर्माने और नियामक कार्रवाइयों से जुड़ी जानकारी छिपाई नहीं जा सकती.

सीआईसी के फुल बेंच के पास पहुंचा मामला

सूचना आयुक्त खुशवंत सिंह सेठी ने बैंकों की ओर से उठाए गए संवेदनशील मुद्दों को देखते हुए इस पूरे मामले को केंद्रीय सूचना आयोग की बड़ी पीठ (फुल बेंच) के पास भेज दिया है. जब तक बड़ी पीठ अंतिम फैसला नहीं सुनाती, तब तक मांगी गई सूचनाओं के खुलासे पर रोक लगा दी गई है. इससे यह मामला अब एक मिसाल बनने की दिशा में बढ़ गया है, जिसका असर पूरे बैंकिंग सेक्टर पर पड़ सकता है.

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा विवाद

बैंक ऑफ बड़ौदा ने आरबीआई के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें उस पर लगे 4.34 करोड़ रुपये के जुर्माने से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने की अनुमति दी गई थी. वहीं, आरबीएल बैंक, यस बैंक और एसबीआई ने भी इसी तरह की सूचनाएं देने पर आपत्ति जताते हुए सीआईसी में अपील की है. बैंकों का कहना है कि नियामक रिपोर्ट और जुर्माने की जानकारी उजागर होने से उनके शेयरधारकों और ग्राहकों में भ्रम फैल सकता है.

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पारदर्शिता बनाम गोपनीयता की लड़ाई

विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का फैसला बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता, जमाकर्ताओं के अधिकार और नियामकीय जवाबदेही को नई दिशा दे सकता है. अगर आरबीआई का पक्ष मजबूत होता है, तो भविष्य में एनपीए और निरीक्षण रिपोर्ट जैसी जानकारियों तक आम जनता की पहुंच आसान हो सकती है. वहीं, अगर बैंकों की दलील मानी गई, तो गोपनीयता को पारदर्शिता पर प्राथमिकता मिल सकती है. ऐसे में यह विवाद सिर्फ सूचना देने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की बैंकिंग व्यवस्था के भविष्य की दिशा भी तय करेगा.

भाषा इनपुट के साथ

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