भारत की GDP 7.8% की बढ़ोतरी, इससे रोजगार और आम आदमी की जिंदगी में कितना फर्क पड़ा?

क्या 7.8% GDP वृद्धि से रोजगार बढ़ा? जानिए भारत के आर्थिक विकास का आम आदमी की जिंदगी और नौकरियों पर क्या असर पड़ा है.

लेखक - शिवपूजन सिंह

भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत और दुनिया की छठे पायदान पर खड़ी है. विकास की तेज रफ्तार और बड़े बाजार ने हिंदुस्तान को दुनिया में अपनी एक अलग हैसियत और ओहदा दिया है.

अभी-अभी वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की शानदार GDP वृद्धि दर्ज की गई. यह आंकड़ा उम्मीद से बेहतर है और दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच भारत की तेज आर्थिक रफ्तार को दिखाता है, क्योंकि दुनिया में अभी मुश्किल हालात, जंग की छाया और मंदी की आशंका के बादल मंडरा रहे हैं. आईटी सेक्टर में AI के आगमन ने भी बहुत कुछ बदल कर रख दिया है, मानो दुनिया अब एक अलग राह पर चलने वाली है.

7.8 प्रतिशत की GDP के आंकड़े गुलाबी तस्वीर तो दिखाते हैं, लेकिन उस मुताबिक आज रोजगार नहीं पैदा हो रहे हैं. देश के करोड़ों युवा रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ रुख या स्वरोजगार के लिए मशक्कत कर रहे हैं. सरकारी नौकरी की कुछ हजार सीटों के लिए लाखों-लाख की भीड़ उमड़ती है. निजी क्षेत्र में भी अच्छी नौकरियां उतनी पैदा नहीं हो रहीं, वहां भी हालात मौजूदा वक्त में उतने मुफीद और मुकाबिल तो नहीं दिखलाई पड़ते हैं.

GDP बढ़ना और रोजगार बढ़ना एक बात नहीं

सच्चाई यह भी है कि GDP बढ़ने से रोजगार बढ़ जाए, यह कोई पैमाना नहीं है; दोनों के अपने-अपने मायने हैं. दरअसल, सबसे पहले हमें GDP और रोजगार के बीच का फर्क समझना होगा. GDP बताती है कि देश में एक निश्चित अवधि में कितनी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन हुआ, लेकिन GDP यह नहीं बताती कि उस उत्पादन से कितने लोगों को नौकरी मिली, कितनी आय बढ़ी और कितनी नौकरियां स्थायी या सुरक्षित हैं. इसीलिए GDP बढ़ने से रोजगार भी बढ़ जाएंगे, ऐसा नहीं है.

सर्विस सेक्टर में रोजगार का योगदान

आज भारतीय अर्थव्यवस्था में सर्विस सेक्टर का बड़ा योगदान जॉब देने में रहा है. वित्त, रियल एस्टेट, प्रोफेशनल सेवाओं और डिजिटल कारोबार जैसे क्षेत्रों में तेज बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन इन क्षेत्रों में हर एक प्रतिशत आर्थिक वृद्धि के साथ उतनी बड़ी संख्या में नौकरियां पैदा नहीं होतीं, जितनी भारत जैसे बड़े श्रमबल वाले देश को चाहिए. नीति आयोग के एक अध्ययन ने भी इस विरोधाभास को बताया है कि सेवाएं राष्ट्रीय उत्पादन में आधे से अधिक योगदान देती हैं, लेकिन रोजगार में उनका हिस्सा उससे काफी कम है और बड़ी संख्या में रोजगार अनौपचारिक और कम आय वाले हैं. मतलब साफ है कि अर्थव्यवस्था तो बढ़ रही है, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता और संख्या का सवाल अलग है.

विकास का फायदा समान रूप से नहीं पहुंच रहा

मौजूदा समय में देश के विकास में एक महत्वपूर्ण हिस्सा पूंजी, तकनीक और उत्पादकता से आता है. कंपनियां अधिक मशीनें, सॉफ्टवेयर और ऑटोमेशन इस्तेमाल कर रही हैं, जिससे इसका फायदा उत्पादन बढ़ाने में होता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उसी अनुपात में नए कर्मचारी भी नियुक्त किए जाएं.

दूसरी तरफ नजर डालें तो, जहां बड़ी संख्या में लोग काम करते हैं जैसे कृषि, निर्माण, छोटे कारोबार, खुदरा व्यापार और असंगठित क्षेत्र वहां उत्पादकता और मजदूरी दोनों की समस्या बनी हुई है.

सवाल जो अभी भी सवाल ही बना हुआ है

GDP तो बढ़ी, लेकिन सवाल जो सिर उठाते हैं कि कितने नए रोजगार पैदा हुए? कितनी नौकरियों की आय बढ़ी? कितने युवाओं को पहली नौकरी मिली? और कितनी नौकरियां ऐसी हैं जिनमें सामाजिक सुरक्षा और भविष्य की स्थिरता है?

हालांकि, भारत में रोजगार के आंकड़ों में पूरी तस्वीर नकारात्मक नहीं है. हालिया PLFS आंकड़ों में बेरोजगारी दर में सुधार भी दिखाई देता है. लेकिन बेरोजगारी दर कम होना अपने-आप में संपूर्ण नहीं है. यदि कोई व्यक्ति कम आय वाले, अस्थायी या अपनी क्षमता से बहुत कम उत्पादक काम में लगा है, तो आंकड़ों में वह 'रोजगार' में शामिल हो सकता है, लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति जरूरी नहीं कि सुधरी हो. इसलिए सवाल यह भी है कि सिर्फ नौकरी होने से कुछ नहीं होने वाला, असल में नौकरी कैसी है, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए.

इसे ऐसे समझते हैं अगर एक इंजीनियर अपनी योग्यता के माफिक नौकरी न मिलने पर बहुत कम वेतन के काम में लग जाए, तो वह बेरोजगार नहीं कहलाएगा, लेकिन उसकी समस्या खत्म भी नहीं होगी.

बड़े पैमाने पर श्रम-प्रधान उद्योगों की जरूरत

भारत के पास दुनिया के विशाल युवाओं का जनसमूह है, लाजिमी है कि एक बड़ा श्रमबल है जो काफी उपयोगी और जरूरी वतन के लिए बन सकता है. लिहाजा इसे देखते हुए, भारत की आर्थिक नीति का एक बड़ा लक्ष्य ऐसे उद्योगों को बढ़ाना होना चाहिए जिनमें बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिल सके. जैसे कपड़ा, जूते-चप्पल, फूड प्रोसेसिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, निर्माण और छोटे-मध्यम उद्योग ऐसे क्षेत्र हैं जहां बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने की क्षमता है.

विनिर्माण क्षेत्र में बढ़ोतरी जरूर हो रही है. सरकार के अनुसार PLI योजनाओं के तहत सितंबर 2025 तक 12.6 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने का दावा किया गया था.

निवेश होने से ही मिलेगा युवाओं को रोजगार

देश में निवेश के बढ़ने से लोगों के हाथों में काम होगा. अगर निजी निवेश बढ़े, छोटे कारोबार तेजी से विस्तार करें, नए उद्योग लगें और कंपनियों को अधिक लोगों को औपचारिक रोजगार देने के लिए प्रोत्साहन मिले, तो तस्वीर बदल सकती है और आज का रोजगार संकट खत्म हो सकता है.

देश की अर्थव्यवस्था में बढ़ती GDP अच्छा संकेत तो जरूर है, लेकिन सच्चाई यह है कि जमीनी स्तर पर एक मेहनतकश इंसान इसे उतना नहीं समझता कि आखिर GDP होती क्या है. लिहाजा बात यही है कि बढ़ती GDP से आखिर एक आम आदमी की जिंदगी कितनी बदली और इसका फायदा उसके रोजमर्रा के जीवन में क्या आया इसे असल में जानना और समझना जरूरी है.

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लेखक के बारे में

By सौम्या शाहदेव

सौम्या शाहदेव प्रभात खबर डिजिटल में बिजनेस कंटेंट राइटर हैं. वह शेयर बाजार, पर्सनल फाइनेंस, टैक्स, सरकारी योजनाओं, बैंकिंग और रोजमर्रा की आर्थिक खबरों को सरल और सटीक भाषा में पाठकों तक पहुंचाती हैं. उनका फोकस ऐसी खबरें लिखने पर रहता है जो सीधे आम लोगों की जिंदगी और जेब पर असर डालती हैं.

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