Inflation Outlook : कुछ समय पहले तक माना जा रहा था कि पश्चिम एशिया के युद्ध के कारण पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे, जिससे देश में महंगाई बढ़ेगी. लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से तेल सप्लाई का संकट टल गया है.
इसके बावजूद भारत के लिए महंगाई की चुनौती कम नहीं हुई है. मुख्य अर्थशास्त्री डॉ. मनोरंजन शर्मा के अनुसार भारत के लिए आज कच्चे तेल से भी बड़ा जोखिम कमजोर मानसून है. इसका कारण बेहद सीधा है. भारतीय महंगाई बास्केट (CPI) में ईंधन (Fuel) के मुकाबले भोजन (Food Items) का वजन (Weightage) कहीं ज्यादा है.”
दरअसल, भारत की खुदरा महंगाई दर को मापने वाले कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) में खाद्य पदार्थों (Food) का हिस्सा 46% है. चूंकि भारत की लगभग आधी खेती आज भी पूरी तरह से बारिश (Rain-fed) पर निर्भर है, इसलिए यदि मानसून कमजोर रहता है, तो अनाज, दालों, तिलहन और हरी सब्जियों के उत्पादन में भारी गिरावट आती है, जिससे कीमतें आसमान छूने लगती हैं.
आपकी रसोई का बजट कितना बिगड़ेगा?
कमजोर मानसून या अल नीनो (El Niño) जैसी मौसमी स्थितियों का सीधा असर आम आदमी की थाली पर पड़ता है.
- सब्जी, दाल और दूध में उछाल: बारिश की कमी से सब्जियों, दालों, खाद्य तेल (Edible Oils) और दूध की महंगाई दर दहाई अंक (Double Digit) को पार कर सकती है. एक मध्यम आय वाले शहरी परिवार का मासिक घरेलू खर्च ₹1,000 से ₹3,000 तक बढ़ सकता है. कम आय वाले और ग्रामीण परिवार इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. ग्रामीणों को एक तरफ तो महंगे राशन की मार झेलनी पड़ती है, और दूसरी तरफ फसल खराब होने से उनकी खेती की कमाई (Farm Income) भी घट जाती है.
महंगाई के मोर्चे पर क्यों है चिंता?
आंकड़े बताते हैं कि देश में महंगाई का दबाव पहले ही दिखने लगा है. अप्रैल के 3.48% के मुकाबले मई में भारत की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 3.93% पर पहुंच गई. इसी दौरान थोक महंगाई दर (WPI) भी बढ़कर 9.68% दर्ज की गई. इन्ही अनिश्चितताओं को देखते हुए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने भी वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए अपने महंगाई के अनुमान को 4.6% से बढ़ाकर 5.1% कर दिया है.
यदि मानसून कमजोर रहता है, तो खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी. ऐसी स्थिति में आरबीआई के लिए ब्याज दरों (Interest Rates) में कटौती करना बेहद मुश्किल हो जाएगा, जिससे आपकी लोन की ईएमआई (EMI) महंगी बनी रह सकती है.
क्या देश में सूखा जैसे हालात बनेंगे?
राहत की बात यह है कि अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, देश में अतीत की तरह भुखमरी या सूखे जैसे बदतर हालात नहीं बनेंगे. पिछले एक दशक में भारत की आर्थिक बुनियादी संरचना काफी मजबूत हुई है.
हमारे पास वर्तमान में बड़े पैमाने पर खाद्यान्न (Foodgrain) का बफर स्टॉक उपलब्ध है.
सिंचाई (Irrigation) का दायरा पहले से कहीं अधिक व्यापक हुआ है.
लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन नेटवर्क में सुधार हुआ है, जिससे सरकार कमी वाले इलाकों में तुरंत अनाज पहुंचा सकती है.
साफ है कि भले ही भारत में कोई बड़ा खाद्य संकट न आए, लेकिन कमजोर मानसून आम जनता की जेब और देश की आर्थिक विकास दर (Economic Growth) दोनों की रफ्तार को धीमा जरूर कर सकता है.
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