Invest in Asian Markets: दुनियाभर के शेयर बाजारों में इस समय बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. भारतीय इन्वेस्टर्स अब अमेरिका (US) से आगे बढ़कर जापान, साउथ कोरिया और ताइवान जैसे एशियाई देशों के मार्केट्स का रुख कर रहे हैं. जून 2026 की शुरुआत में ताइवान का मार्केट कैपिटलाइजेशन बढ़कर 5.15 ट्रिलियन डॉलर और साउथ कोरिया का 5.04 ट्रिलियन डॉलर हो गया. इन दोनों ने भारत (4.84 ट्रिलियन डॉलर) को पीछे छोड़ दिया है. इस साल साउथ कोरिया का KOSPI इंडेक्स 110% से ज्यादा और ताइवान का मार्केट 65% से अधिक उछल चुका है, जबकि भारतीय बाजार कुछ सुस्त रहा है.
जापान में कड़े कॉर्पोरेट सुधार हो रहे हैं, ताइवान AI और सेमीकंडक्टर का सबसे बड़ा हब है, और साउथ कोरिया टेक दिग्गजों का घर है. ऐसे में अगर आप भी इन मार्केट्स में इन्वेस्ट करना चाहते हैं, तो इसके बारे में जानना बेहद जरूरी है.
क्या इन देशों में पैसा लगाना कानूनी है?
हां, कानूनी रूप से इसमें कोई रोक नहीं है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की ‘लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम’ (LRS) के तहत कोई भी भारतीय नागरिक एक फाइनेंशियल ईयर में 250,000 डॉलर (लगभग 2.4 करोड़ रुपये) विदेश भेज सकता है. इस लिमिट में आपकी विदेश यात्रा, पढ़ाई और इन्वेस्टमेंट सब कुछ शामिल है. दिक्कत कानून की नहीं, बल्कि जमीनी प्रोसेस की है. भारत के मशहूर ऐप्स (जैसे Groww, Vested या INDMoney) मुख्य रूप से अमेरिकी स्टॉक्स के लिए बने हैं. इनके जरिए आपको एशिया के बाजारों का डायरेक्ट एक्सेस नहीं मिलता, बल्कि अमेरिकी एक्सचेंज पर लिस्टेड ETFs या ADRs के जरिए रास्ता मिलता है.
डायरेक्ट शेयर खरीदना कितना मुश्किल है?
तीनों देशों के नियम अलग-अलग हैं. जापान में डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट करना सबसे आसान है. साउथ कोरिया ने भी दिसंबर 2023 में अपना 30 साल पुराना फॉरेन इन्वेस्टर रजिस्ट्रेशन नियम खत्म कर दिया है, जिससे अब वहां सिर्फ पासपोर्ट या LEI नंबर से अकाउंट खुल जाता है. सबसे मुश्किल ताइवान है. वहां किसी भारतीय को डायरेक्ट शेयर खरीदने के लिए ताइवान स्टॉक एक्सचेंज से इन्वेस्टर आईडी लेनी होगी, लोकल सिक्योरिटीज फर्म में अकाउंट खोलना होगा और एक लोकल कस्टोडियन नियुक्त करना होगा. आम रिटेल इन्वेस्टर्स के लिए यह बेहद जटिल है, इसलिए भारतीय लोग ताइवान में पैसा लगाने के लिए भारत-आधारित म्यूचुअल फंड स्कीम्स या ETFs (जैसे iShares MSCI Japan, South Korea या Taiwan ETF) का सहारा लेते हैं. डायरेक्ट ट्रेडिंग के लिए ‘इंटरैक्टिव ब्रोकर्स’ (IBKR) जैसे ग्लोबल ब्रोकर्स की मदद लेनी पड़ती है. ध्यान रहे कि शेयरों को बेचने के बाद पैसा 180 दिनों के भीतर भारत वापस लाना जरूरी है.
इस इन्वेस्टमेंट पर कितना खर्च आएगा?
विदेश में पैसा भेजने पर बैंक ट्रांसफर फीस, जीएसटी (GST) और करेंसी कन्वर्जन स्प्रेड (0.5% से 2%) लगता है. अगर आपका सालाना विदेशी इन्वेस्टमेंट 10 लाख रुपये से ज्यादा है, तो 20% टीसीएस (TCS) कटेगा, जो बाद में आपके टैक्स रिटर्न में एडजस्ट हो जाता है.
इसके अलावा वहां के लोकल टैक्स भी अलग हैं:
- जापान: नॉन-रेसिडेंट्स से कोई सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) नहीं लेता.
- साउथ कोरिया: बेचने वाले पर 0.20% का ट्रांजैक्शन टैक्स लगाता है.
- ताइवान: सबसे महंगा है, यहां शेयर बिक्री की कुल रकम पर 0.3% टैक्स लगता है.
कमाई पर टैक्स कैसे कैलकुलेट होगा?
टैक्स के दो हिस्से हैं सोर्स देश और भारत. जापान और ताइवान नॉन-रेसिडेंट्स से कैपिटल गेन्स (मुनाफे) पर टैक्स नहीं लेते. साउथ कोरिया छोटे निवेशकों (25% से कम हिस्सेदारी वाले) पर टैक्स नहीं लगाता, लेकिन ब्रोकर सुरक्षा के लिए टैक्स काट सकता है, जिसे बाद में क्लेम करना पड़ता है.
भारत में इन विदेशी शेयरों को अनलिस्टेड एसेट्स माना जाता है. अगर आप शेयर को 24 महीने (2 साल) से ज्यादा रखकर बेचेंगे, तो मुनाफे पर 12.5% लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स लगेगा (बिना इंडेक्सेशन के). 24 महीने या उससे पहले बेचने पर यह शॉर्ट-टर्म गेन (STCG) माना जाएगा और आपकी इनकम टैक्स स्लैब (जो 30% तक हो सकती है) के हिसाब से टैक्स लगेगा. डिविडेंड (लाभांश) मिलने पर सोर्स देश पहले ही 15.3% से 22% तक टैक्स काट लेता है, फिर वह रकम भारत में आपकी कुल कमाई में जुड़ती है. हालांकि, फॉर्म 67 भरकर आप फॉरेन टैक्स क्रेडिट (FTC) का फायदा ले सकते हैं.
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