Direct vs Regular Mutual Fund: म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले कई लोग रेगुलर प्लान से डायरेक्ट प्लान में शिफ्ट होने का सोचते हैं, क्योंकि डायरेक्ट प्लान का एक्सपेंस रेशियो कम होता है. यानी फंड चलाने का खर्च कम कटता है और रिटर्न थोड़ा ज्यादा मिल सकता है. लेकिन ज्यादातर निवेशक टैक्स के डर से यह कदम नहीं उठाते.
आखिर डायरेक्ट प्लान सस्ता क्यों पड़ता है?
रेगुलर प्लान में निवेशक के पैसे का एक हिस्सा डिस्ट्रिब्यूटर या एजेंट की कमीशन में जाता है. वहीं डायरेक्ट प्लान में यह खर्च नहीं होता. इसी वजह से डायरेक्ट प्लान का एक्सपेंस रेशियो कम रहता है. यही छोटा सा फर्क लंबे समय में बड़ा फायदा दे सकता है. कई फंड्स में डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के रिटर्न में 0.5% से 1% तक का अंतर देखने को मिलता है.
स्विच करने पर टैक्स कितना लगेगा?
जब कोई निवेशक रेगुलर प्लान से डायरेक्ट प्लान में जाता है, तो इसे पुराने यूनिट्स बेचकर नए यूनिट्स खरीदने जैसा माना जाता है. ऐसे में कैपिटल गेन्स टैक्स देना पड़ सकता है. अगर निवेश एक साल से ज्यादा पुराना है, तो ₹1.25 लाख तक के लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) पर टैक्स नहीं लगता. इसके ऊपर के गेन्स पर 12.5% टैक्स देना होता है. मान लीजिए किसी निवेशक का कुल LTCG 6.38 लाख रुपये है. इसमें 1.25 लाख रुपये की छूट हटाने के बाद 5.13 लाख रुपये पर टै्स लगेगा. इस हिसाब से करीब 64,202 रुपये टैक्स देना पड़ेगा.
फिर भी फायदा कैसे हो सकता है?
अगर किसी निवेशक ने 10 साल तक हर महीने 5000 रुपये SIP किया हो, तो उसका कुल निवेश 6 लाख रुपये होगा. रेगुलर प्लान में 13.07% रिटर्न के हिसाब से उसका कॉर्पस करीब 12.38 लाख रुपये बन सकता है. टैक्स देने के बाद उसके पास लगभग 11.74 लाख रुपये बचेंगे. अगर यही रकम डायरेक्ट प्लान में आगे निवेश की जाए और अगले 20 साल तक समान रिटर्न मिले, तो बड़ा फर्क दिख सकता है.
अनुमान के मुताबिक 20 साल बाद:
- रेगुलर प्लान कॉर्पस: करीब 1.37 करोड़ रुपये
- डायरेक्ट प्लान कॉर्पस: करीब 1.55 करोड़ रुपये
यानी लगभग 18.5 लाख रुपये का अंतर बन सकता है.
क्या तुरंत स्विच कर लेना चाहिए?
हर निवेशक के लिए जवाब एक जैसा नहीं है. अगर आपको इनवेस्टमेंट समझने और मैनेज करने में दिक्कत नहीं होती, तो डायरेक्ट प्लान लंबी अवधि में ज्यादा फायदेमंद हो सकता है. लेकिन जिन लोगों को एडवाइजर या डिस्ट्रिब्यूटर की मदद चाहिए, उनके लिए रेगुलर प्लान भी ठीक विकल्प हो सकता है. फैसला लेते समय टैक्स, निवेश अवधि और अपनी जरूरत तीनों चीजें जरूर देखनी चाहिए.
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