हाथी ने ढूंढ़ा भारत में तेल का अकूत भंडार, असम में इस स्थान पर खड़ी है एशिया की सबसे पुरानी रिफाइनरी

Digboi Refinery: साल 1889 में असम के डिगबोई में हाथियों की मदद से रेलवे लाइन बिछाने के दौरान उनके पैरों पर तेल देखकर भारत में तेल की खोज हुई. इसके बाद उसी साल डिगबोई में पहला व्यावसायिक रूप से सफल तेल कुआं खोदा गया. नाम “डिगबोई” मजदूरों के नारे “डिग बॉय डिग” से पड़ा. यह खोज भारत के तेल उद्योग के लिए मील का पत्थर बनी और 1901 में डिगबोई में एशिया की सबसे पुरानी तेल रिफाइनरी स्थापित की गई.

Digboi Refinery: क्या आप इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि हाथी कच्चे तेल का अकूत भंडार खोज सकता है? इस सवाल को आप एक मजाक भी समझ सकते हैं, लेकिन यह हकीकत है. असम के डिगबोई में जिस स्थान पर आप एशिया की सबसे पुरानी रिफाइनरी देख रहे हैं, कभी उस जगह पर तेल के अकूत भंडार की खोज हाथियों ने की थी या फिर आप कह सकते हैं कि हाथियों के जरिए तेल के अकूत भंडार की खोज हुई थी. आइए, इसके बारे में रोचक कहानी के बारे में जानते हैं.

हाथी से कैसे हुई तेल की खोज

संसद टीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 1889 में असम रेलवे एंड ट्रेडिंग कंपनी के इंजीनियर डिब्रूगढ़ से मार्गेरेटा तक रेलवे लाइन बिछाने का काम कर रहे थे. रेलवे लाइन बिछाने के काम में हाथियों का इस्तेमाल किया जा रहा था. इस दौरान कंपनी के इंजीनियरों ने देखा कि जो हाथी लाइन बिछाने के लिए सामान लेकर आ रहे हैं, उनके पैर तेल से सने हुए हैं. यह देखकर इंजीनियरों की आंखें आश्चर्य से फटी रह गईं. उन्होंने इसकी सूचना कंपनी के अधिकारियों को दी और फिर वहां पर तेल की खोज में खुदाई शुरू हो गई. इस घटना के बाद 1889 में ही असम के डिगबोई में पहला तेल कुआं खोदा गया और भारत का पहला व्यावसायिक रूप से सफल तेल क्षेत्र बन गया.

डिगबोई में कब शुरू हुई खुदाई

असम रेलवे एंड ट्रेडिंग कंपनी की ओर से असम के डिगबोई में तेल के अकूत भंडार की खोज किए जाने के बाद सितंबर 1889 में खुदाई शुरू की गई और 662 फीट की गहराई पर तेल मिला. यह भारत का पहला व्यावसायिक रूप से सफल तेल कुआं था, जिसे ‘वेल नंबर 1’ के नाम से जाना गया.

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क्यों पर डिगबोई नाम

असम में डिब्रूगढ़ और मार्गेरेटा के बीच जिस स्थान पर तेल के कुएं की खुदाई की गई, उस स्थान का नाम डिगबोई रखा गया. इस नाम के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि 1889 में तेल के अकूत भंडार का पता चलने के बाद जब वहां पर कुएं की खुदाई चल रही थी, इस काम में लगे मजदूर “डिग, बॉय, डिग!” यानी खोदो बालक, खोदो के नारे जोर-जोर से लगाते थे. इसके बाद इस जगह का नाम “डिगबोई” पड़ गया. यह खोज भारत के तेल उद्योग में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुई और बाद में 1901 में डिगबोई में एशिया की पहली तेल रिफाइनरी स्थापित की गई.

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लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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