Cigarette Price Hike : आज के दौर में भी कई दुकानदार ठंडे पानी की बोतल, दूध के पैकेट या अन्य सामानों पर प्रिंट रेट (MRP) से 5-10 रुपये ज्यादा वसूलते हैं. आम जनता अक्सर बहस से बचने के लिए यह अतिरिक्त पैसा दे देती है. लेकिन उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में एक जागरूक ग्राहक ने इस ‘छिपी हुई लूट’ के खिलाफ ऐसी कानूनी लड़ाई लड़ी, जिसने बड़ी-बड़ी कंपनियों और मनमानी करने वाले दुकानदारों को हिलाकर रख दिया है.
अलीगढ़ के जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मात्र 20 रुपये की अतिरिक्त वसूली (कालाबाजारी) के मामले में दुकानदार और संबंधित ब्रांडेड सिगरेट निर्माता कंपनी पर 10 लाख रुपये का संयुक्त जुर्माना लगाया है.
क्या है पूरा मामला? जानिए सिलसिलेवार ढंग से
दुकानदार की मनमानी: अलीगढ़ जिला उपभोक्ता आयोग के ठीक सामने प्रतिभा कॉलोनी में हीरा लाल वार्ष्णेय की एक दुकान है. जनवरी 2026 के आखिरी हफ्ते में रघुवीरपुरी के रहने वाले वकील देवेश गौतम इस दुकान पर सिगरेट का एक पैकेट खरीदने पहुंचे.
- ₹20 अतिरिक्त की मांग: सिगरेट के पैकेट पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) ₹340 छपा हुआ था. इसके बावजूद दुकानदार हीरा लाल ने ₹360 की मांग की. जब ग्राहक (वकील देवेश) ने इसका विरोध किया, तो दुकानदार बहस पर उतारू हो गया और सामान देने से मना करने लगा.
- डिजिटल पेमेंट बना अकाट्य सबूत: दुकानदार की मनमानी को देखते हुए देवेश गौतम ने शांत दिमाग से काम लिया. उन्होंने बहस करने के बजाय दुकानदार को ऑनलाइन माध्यम से ₹360 का भुगतान कर दिया. इसके बाद उन्होंने इस डिजिटल ट्रांजैक्शन का प्रिंट आउट निकाला और फरवरी 2026 में पुख्ता सबूत के साथ जिला उपभोक्ता आयोग में केस दर्ज करा दिया.
5 महीने में आया फैसला, कोर्ट ने लगाई कड़ी फटकार
इस मामले की सुनवाई जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष हसनैन कुरैशी और सदस्य पूर्णिमा सिंह राजपूत की अदालत में हुई. कोर्ट के नोटिस भेजने के बावजूद आरोपी दुकानदार अदालत में हाजिर नहीं हुआ.Vवहीं, सिगरेट बनाने वाली बड़ी ब्रांडेड कंपनी ने कोर्ट में अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की. कंपनी के वकीलों ने दलील दी कि संबंधित दुकानदार उनका ‘अधिकृत वेंडर’ (Authorised Vendor) नहीं है और न ही उससे कंपनी का कोई सीधा लेना-देना है, इसलिए इस कालाबाजारी के लिए कंपनी जिम्मेदार नहीं है.
अदालत ने कंपनी की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया. कोर्ट ने बेहद कड़े शब्दों में कहा “कंपनियां अपने ब्रांड और प्रोडक्ट की आड़ में बाजार में हो रही कालाबाजारी से मुंह नहीं मोड़ सकतीं. दुकानदार भले ही डायरेक्ट वेंडर न हो, लेकिन वह कंपनी का ही सामान बेच रहा था, इसलिए उसे सब-एजेंट माना जाएगा. यह आम जनता के साथ एक तरह की ‘छिपी हुई लूट’ है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.”
जुर्माना और मुआवजे का पूरा गणित
अदालत ने इसे व्यापार का बेहद गलत और अनुचित तरीका (Unfair Trade Practice) मानते हुए 16 जून 2026 को आदेश जारी किए.
- ₹10 लाख का जुर्माना: कंपनी और दुकानदार को 45 दिनों के भीतर ₹10 लाख की जुर्माना राशि उपभोक्ता कल्याण कोष (Consumer Welfare Fund) में जमा करानी होगी.
- 18% वार्षिक ब्याज: पीड़ित ग्राहक से वसूले गए अतिरिक्त ₹20 को 18% सालाना ब्याज के साथ वापस करना होगा.
- मानसिक प्रताड़ना का मुआवजा: ग्राहक को हुई मानसिक परेशानी के एवज में ₹5,000 का हर्जाना देना होगा.
- अदालती खर्च: कानूनी लड़ाई में हुए खर्च के रूप में पीड़ित को ₹5,000 अलग से दिए जाएंगे (यानी ग्राहक को कुल ₹10,000 का मुआवजा मिलेगा).
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