मुंबई : गिरवी रखे हुए शेयरों पर म्यूचुअल फंडों से कंपनियों को दोबारा कर्ज लेना अब आसान नहीं रहा. इसका कारण यह है कि भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कुछ म्यूचुअल फंड कंपनियों की ओर से कंपनियों के प्रवर्तकों के शेयरों को गिरवी रख कर उन्हें कर्ज देने के मामलों को गंभीरता से लेते हुए गिरवी रखे शेयरों के बारे में सूचना देने के नियमों कड़े कर दिये हैं. सेबी के सामने कई ऐसे मामले आये हैं, जहां शेयर पर कर्ज योजना में ऋण पत्रों में निवेश करने वाले म्यूचुअल फंडों ने कम पहचान या निम्न रेटिंग वाली कंपनियों के ऋण पत्रों में उनके प्रवर्तकों के शेयरों के आधार पर धन लगाया.
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सेबी के निदेशक मंडल की बैठक के बाद जारी नये निर्देशों में नियामक ने कहा है कि शेयरों पर किसी तरह की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष देनदारी होने पर उन्हें बंधक शेयर माना जायेगा. सेबी ने कहा है कि यदि बंधक या गिरवी रखे शेयरों का आंकड़ा कंपनी की शेयर इक्विटी पूंजी के 20 फीसदी को पार कर जाता है, तो प्रवर्तकों को इसकी लिखित रूप से वजह बतानी होगी.
यहां उल्लेखनीय है कि प्रमुख गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों (एनबीएफसी) में नकदी संकट के बाद डीएचएफएल जैसे शैडो बैंकों और मीडिया क्षेत्र के जी ग्रुप सहित कई अन्य कंपनियों ने अपने कर्ज के भुगतान में चूक की. हालांकि, दोनों कंपनियों ने अपने ऋणदाताओं के साथ शेयरों के संबंध में यथास्थिति कायम रखने का करार किया है.
सबसे बड़ी संपत्ति प्रबंधन कंपनी एचडीएफसी एसेट मैनेजमेंट कंपनी ने कहा कि वह डीएचएफएल की 500 करोड़ रुपये की एनसीडी की पुनर्खरीद करेगी, जो वह अपने निश्चित आय योजना के निवेशकों से समय पर भुना नहीं पायी. इसका मतलब है कि एचडीएफसी एएमसी को 500 करोड़ रुपये की चोट लगेगी. हालांकि, कोटक एएमसी जो अपनी यूनिट्स को समय पर भुना नहीं पायी, उसने अपने निश्चित आय योजना के निवेशकों को भुगतान के लिए एक साल और इंतजार करने को कहा.
सेबी ने कहा कि यदि किसी कंपनी के गिरवी रखे शेयर 20 फीसदी से अधिक हो जाते हैं, तो ऑडिट पैनल को किसी भी बंधक रखे शेयरों जिनका खुलासा नहीं किया गया है, की जानकारी देनी होगी.
