नयी दिल्ली : इस्पात क्षेत्र के लिए साल 2018 उथल-पुथल भरा रहा. इस क्षेत्र में वित्तीय संकट की स्थिति और बिगड़ने से कर्ज अदा नहीं कर पाने के मामले सामने आये और कुछ कंपनियां दिवालिया भी हुईं. कई वैश्विक दिग्गजों समेत मौजूदा प्रवर्तकों ने दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता प्रक्रिया के जरिये क्षेत्र में पांव जमाने की कोशिश की, जिसमें अधिकांश मामले अंतत: अदालत तक घसीटे गये.
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विशेषज्ञों तथा उद्योग जगत के अनुसार, इस्पात क्षेत्र के लिए उचित कीमत पर कच्चे माल की उपलब्धता पर संशय के बादल छाये रहने तथा चीन से सस्ती डंपिंग के खतरे ने स्थिति को और खराब किया. हालांकि, सरकार ने हिम्मत से काम लिया और नये साल में प्रति व्यक्ति इस्पात की खपत बढ़ाना, भारत निर्मित इस्पात के लिए नये बाजार खोजना और उद्योग जगत को विशिष्ट इस्पात के उत्पादन के लिए प्रेरित करना उसकी प्राथमिकता में है.
सरकार ने मार्च, 2018 के अंत तक सालाना 13.8 करोड़ टन कच्चा इस्पात उत्पादन को बढ़ाकर 2030 तक 30 करोड़ टन करने का लक्ष्य तय किया है. प्रति व्यक्ति इस्पात की खपत के लिए भी 2030 तक 160 किलोग्राम का लक्ष्य रखा गया है. केंद्रीय इस्पात मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कहा कि भारत में प्रति व्यक्ति इस्पात की खपत करीब 68 किलोग्राम है, जबकि इसका वैश्विक औसत करीब 208 किलोग्राम है. यह बेहद कम है. उन्होंने कहा कि बाजार तभी संभव है जब उपभोग भी बढ़े. नये साल में हमारा ध्यान देश की प्रति व्यक्ति इस्पात खपत को बढ़ाना है.
नये साल में अदालत से कई निर्णय सामने आ सकते हैं, जिनमें दिवाला एवं ऋणशोधन प्रक्रिया से संबंधित निजी कंपनियों का भाग्य तय होगा. स्थापित वैश्विक इस्पात दिग्गजों, नयी कंपनियों तथा मौजूदा प्रवर्तकों के बीच सघन खींचतान देखी जा सकती है. इस दौरान बैंक भी खींचतान के दरम्यान अपना अधिकाधिक पैसा बचाने की कोशिश करेंगे. आकलनों के अनुसार, कर्जदाता अभी तक इस्पात क्षेत्र में फंसे कर्जों के कारण हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठा चुके हैं. चीन के बाद भारत इस्पात का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है.
