नाबालिग को गाड़ी की चाबी देना पड़ेगा भारी, सिर्फ जुर्माना ही नहीं बल्कि माता-पिता को भी हो सकती है 3 साल की जेल

18 साल से कम उम्र के बच्चों को बाइक या कार चलाने देना माता-पिता को भारी पड़ सकता है. मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 199A के तहत ऐसे मामलों में अभिभावकों को 3 साल की जेल, 25 हजार रुपये का जुर्माना और गाड़ी का रजिस्ट्रेशन रद्द होने जैसी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है. जानें क्या कहते हैं नियम.

देश के कई हिस्से ऐसे हैं जहां आज भी 18 साल से कम उम्र के बच्चे बाइक, स्कूटी या कार चलाते हैं. कई परिवार इसे सामान्य बात मानते हैं. स्कूल, कोचिंग या आसपास के इलाके में जाने के लिए नाबालिगों को वाहन की चाबी दे दी जाती है. लेकिन यह लापरवाही परिवार पर भारी पड़ सकती है. नाबालिग के वाहन चलाने का मामला सिर्फ चालान या जुर्माने तक सीमित नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के आधार पर माता-पिता, Guardian या वाहन मालिक भी कानूनी कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं.

Motor Vehicles Act की Section 3 के अनुसार सार्वजनिक स्थान पर मोटर वाहन चलाने के लिए प्रभावी Driving Licence होना जरूरी है. वहीं Section 4 में वाहन चलाने की उम्र से जुड़े प्रावधान हैं. सामान्य तौर पर 18 साल से कम उम्र में कार या सामान्य मोटरसाइकिल चलाने की अनुमति नहीं है. हालांकि, कानून में 16 साल की उम्र पूरी करने के बाद 50cc तक की मोटरसाइकिल चलाने के लिए लाइसेंस की व्यवस्था है, जिसके लिए तय शर्तें और अभिभावक की लिखित सहमति जरूरी है।

इसका मतलब यह है कि सिर्फ 16 या 17 साल की उम्र पूरी कर लेना सामान्य बाइक, स्कूटी या कार चलाने की अनुमति नहीं देता. वाहन का प्रकार और उसके लिए वैध Driving Licence, दोनों जरूरी हैं.

नाबालिग वाहन चलाए तो माता-पिता की भी तय हो सकती है जिम्मेदारी

Underage Driving के मामलों में Motor Vehicles Act की Section 199A महत्वपूर्ण है. इसके तहत अगर किसी Juvenile से वाहन चलाते समय कानून के तहत अपराध होता है तो उसके Guardian या वाहन मालिक पर भी कार्रवाई हो सकती है.

कानून के मुताबिक ऐसी स्थिति में Guardian या वाहन मालिक को दोषी ठहराए जाने पर 3 साल तक की जेल और 25 हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है. हालांकि Guardian या वाहन मालिक यह साबित कर सकता है कि उसे अपराध की जानकारी नहीं थी या उसने अपराध को रोकने के लिए उचित सावधानी बरती थी.

मामला सिर्फ जेल और जुर्माने तक ही नहीं रुकता. ऐसी स्थिति में संबंधित वाहन का Registration 12 महीने के लिए रद्द किया जा सकता है. यानी अगर परिवार के वाहन को नाबालिग चलाते हुए पकड़ा जाता है और कानून के तहत मामला बनता है, तो उसका असर वाहन पर भी पड़ सकता है.

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बिहार में 2023-24 के दौरान कितने चालान?

केंद्र सरकार की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक 2023 और 2024 के दौरान बिहार में Underage Driving से जुड़े 1,316 e-Challans जारी किए गए. इन मामलों में करीब 44.3 लाख रुपये का जुर्माना वसूला गया. राज्यसभा में साझा किए गए उपलब्ध छह राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के e-challan डेटा में बिहार का आंकड़ा सबसे अधिक रहा.

हालांकि, इन आंकड़ों को बिहार में Underage Driving के सभी मामलों की कुल संख्या नहीं माना जा सकता. ये e-Challan से जुड़े मामले हैं. इसी तरह इन्हें नाबालिगों से हुई सड़क दुर्घटनाओं की संख्या के तौर पर भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

बिहार में परिवहन विभाग और पुलिस की ओर से समय-समय पर नाबालिगों के वाहन चलाने के खिलाफ अभियान भी चलाए जाते रहे हैं. अक्टूबर 2024 में परिवहन विभाग ने नाबालिगों के E-Rickshaw और Three-Wheeler चलाने के खिलाफ विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए थे. भोजपुर में भी समय-समय पर नाबालिगों की ड्राइविंग के खिलाफ कार्रवाई की गई है.

नाबालिगों तक वाहन पहुंचता कैसे है?

Underage Driving पर कार्रवाई के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि नाबालिगों के हाथ में वाहन की चाबी पहुंचती कैसे है. कई मामलों में वाहन परिवार के किसी सदस्य के नाम पर होता है. बच्चा स्कूल या कोचिंग जाने के लिए बाइक या स्कूटी लेकर निकलता है और परिवार को इसकी जानकारी भी होती है.

यहीं Motor Vehicles Act की Section 199A का महत्व बढ़ जाता है. कानून केवल यह नहीं देखता कि वाहन चला कौन रहा था, बल्कि यह भी सवाल उठता है कि वाहन नाबालिग के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कैसे हुआ.

इसलिए माता-पिता और वाहन मालिकों के लिए यह समझना जरूरी है कि नाबालिग को वाहन देना केवल घर का फैसला नहीं है. अगर वही वाहन किसी हादसे या दूसरे Motor Vehicle offence में शामिल हो जाता है तो उसका कानूनी असर परिवार तक पहुंच सकता है.

Instagram Reel से सामने आ सकता है मामला, लेकिन हर Viral Video सबूत नहीं

आज Underage Driving का एक नया पहलू Social Media भी है. बाइक या कार चलाते हुए नाबालिगों के वीडियो और Reels अक्सर सोशल मीडिया पर दिखाई देते हैं. कई बार ऐसे वीडियो में वाहन का नंबर, चालक का चेहरा और लोकेशन जैसी जानकारी भी नजर आती है.

हालांकि किसी Viral Video को सीधे पुलिस का प्रमाणित सबूत मानना सही नहीं होगा. अगर किसी मामले में Social Media Video के आधार पर कार्रवाई की जाती है तो इसकी पुष्टि पुलिस के आधिकारिक बयान, FIR या दूसरे सरकारी रिकॉर्ड से होना जरूरी है.

इसलिए Underage Driving से जुड़ी किसी खबर में सोशल मीडिया पर मौजूद वीडियो को कार्रवाई का आधार बताते समय भी स्वतंत्र तथ्य-जांच जरूरी है.

25 साल की उम्र तक Licence पर पड़ सकता है असर

Section 199A का एक महत्वपूर्ण प्रावधान नाबालिग के भविष्य के Driving Licence से जुड़ा है. कानून के मुताबिक Juvenile के जरिए किए गए अपराध की स्थिति में उसे 25 साल की उम्र तक Driving Licence या Learner Licence जारी नहीं किया जा सकता.

इसके अलावा अपराध में इस्तेमाल वाहन का रजिस्ट्रेशन भी 12 महीने के लिए रद्द किया जा सकता है.

यानी नाबालिग को बाइक या कार चलाने देने का फैसला सिर्फ आज के चालान का मामला नहीं है. परिस्थितियों के आधार पर इसका असर वाहन मालिक और बच्चे, दोनों के भविष्य पर पड़ सकता है.

सिर्फ नाबालिग को पकड़ना ही समाधान नहीं

Underage Driving को रोकने के लिए पुलिस की सड़क पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन इसके साथ वाहन मालिक और Guardian की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. आखिर नाबालिग तक वाहन और उसकी चाबी पहुंची कैसे, यह सवाल भी कार्रवाई का अहम हिस्सा है.

बिहार में उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि पिछले उपलब्ध वर्षों में Underage Driving के कई e-Challans सामने आए हैं. हालांकि यह जानना भी जरूरी है कि इनमें कितने मामलों में Vehicle Owner या Guardian के खिलाफ Section 199A के तहत कार्रवाई हुई. यह आंकड़ा Underage Driving के खिलाफ सरकारी कार्रवाई की वास्तविक तस्वीर को और स्पष्ट कर सकता है.

नाबालिग के हाथ में वाहन की चाबी देना परिवार के लिए कुछ मिनट की सुविधा हो सकती है, लेकिन अगर वही वाहन किसी अपराध या दुर्घटना में शामिल हो जाता है तो इसका असर लंबे समय तक रह सकता है. इसलिए 18 साल से पहले Steering संभालने वाले बच्चे के साथ-साथ चाबी सौंपने वाले बड़े की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठना जरूरी है.

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By Suyash Pandey

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