Google Doodle Today: बेटे को हुआ चिकनपॉक्स तो डॉ मिचियाकी ताकाहाशी ने बना दी वैक्सीन, आज का डूडल इनके नाम

Google Doodle Today जापान के वायरोलॉजिस्ट डॉ मिचियाकी ताकाहाशी ने वर्ष 1974 की शुरुआत में चिकनपॉक्स के खिलाफ एक टीका विकसित किया था. डॉ ताकाहाशी ने इस टीके नाम 'ओका' रखा था, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया भर में चिकनपॉक्स के खिलाफ व्यापक इस्तेमाल की मंजूरी दी थी.

Google Doodle Today: सर्च इंजन गूगल डूडल के जरिए चिकिनपॉक्स की दवा बनाकर दुनिया को नई जिंदगी देने वाले जापान के वायरोलॉजिस्ट डॉ मिचियाकी ताकाहाशी 94वां जन्मदिन मना रहा है. गूगल के इस डूडल को टोक्यो के कलाकार तात्सुरो किउची ने चित्रित किया है. डॉ मिचियाकी ताकाहाशी का जन्म वर्ष 1928 में जापान के ओसाका में हुआ था और मिचियाकी ताकाहाशी का निधन 23 दिसम्बर, 2013 को हुआ था.

जापान के वायरोलॉजिस्ट डॉ मिचियाकी ताकाहाशी ने वर्ष 1974 की शुरुआत में चिकनपॉक्स के खिलाफ एक टीका विकसित किया था. डॉ ताकाहाशी ने इस टीके नाम ‘ओका’ रखा था, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया भर में चिकनपॉक्स के खिलाफ व्यापक इस्तेमाल की मंजूरी दी थी. संक्रामक वायरल रोग और इसके संचरण के गंभीर मामलों को रोकने के लिए डॉ ताकाहाशी का यह टीका काफी प्रभावी बताया जाता है. यह अब तक दुनिया भर में लाखों बच्चों इस टीके के इस्तेमाल कर नई जिंदगी दी गई है.

डॉ ताकाहाशी ने ओसाका विश्वविद्यालय से मेडिकल की डिग्री हासिल की और वर्ष 1959 में उन्हें ओसाका विश्वविद्यालय के माइक्रोबियल रोग अनुसंधान संस्थान में एक शोधकर्ता के रूप में काम करने का मौका मिला. खसरा और पोलियोवायरस का अध्ययन करने के बाद डॉ ताकाहाशी ने 1963 में संयुक्त राज्य अमेरिका के बायलर कॉलेज में एक शोध फेलोशिप स्वीकार की. यह वही समय था, जब उनके बेटा चिकनपॉक्स से गंभीर मुकाबला कर रहा था. बेटे की इस बीमारी ने उन्हें गंभीर संक्रामक वायरस से निपटने के लिए टीका विकसित करने के लिए प्रेरित किया.

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डॉ ताकाहाशी ने चिकनपॉक्स के खिलाफ पहला टीका विकसित किया था. डॉ ताकाहाशी का यह जीवन रक्षक टीके का उपयोग 80 से अधिक देशों में वर्षों से किया जा रहा है. चिकनपॉक्स रोग को रोकने के लिए एक प्रभावी उपाय के रूप में दुनिया भर के लाखों बच्चों को दिया गया है. उन्होंने जानवरों और मानव ऊतकों में जीवित लेकिन कमजोर चिकनपॉक्स वायरस का संवर्धन शुरू किया और विकास के पांच वर्षों के भीतर यह नैदानिक ​​​​परीक्षणों के लिए तैयार था.

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