क्या आपकी बाइक में भी नहीं है किक स्टार्ट? जानिए इलेक्ट्रिक स्टार्ट का वो सच जो कोई नहीं बताता

बाइक में किक स्टार्ट और इलेक्ट्रिक स्टार्ट के काम करने का तरीका पूरी तरह अलग है. जानिए सेल्फ स्टार्ट की वो बड़ी कमजोरियां जो भारी बारिश या कड़ाके की ठंड में आपकी गाड़ी को बीच रास्ते में ठप कर सकती हैं

आज की आधुनिक मोटरसाइकिलों और स्कूटर्स से किक स्टार्ट का गायब होना सिर्फ एक फैशन या डिजाइन का बदलाव नहीं है, बल्कि इसके पीछे ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग का एक पूरा गणित छिपा हुआ है. आधी सदी से भी ज्यादा समय तक दुपहिया वाहनों की जान रहे किक स्टार्ट को अब इलेक्ट्रिक स्टार्ट (सेल्फ स्टार्ट) ने लगभग पूरी तरह रिप्लेस कर दिया है. जहां एक तरफ सेल्फ स्टार्ट ने राइडर्स की जिंदगी को बेहद आसान और आरामदायक बना दिया है, वहीं दूसरी तरफ खराब मौसम या बैटरी डेड होने की स्थिति में यह तकनीक राइडर्स के लिए एक बड़ी मुसीबत भी खड़ी कर देती है. आइए समझते हैं कि ये दोनों सिस्टम अंदर से कैसे काम करते हैं और आपके सफर के लिए कौन सा ज्यादा भरोसेमंद है.

कैसे काम करता है पैर से इंजन जगाने वाला किक स्टार्ट मैकेनिज्म?

किक स्टार्ट एक पूरी तरह से मैकेनिकल प्रक्रिया है, जिसे चालू करने के लिए किसी बाहरी इलेक्ट्रिकल पावर या बैटरी की जरूरत नहीं होती. जब आप बाइक के लीवर पर पैर से दबाव बनाते हैं, तो यह लीवर सीधे इंजन के क्रैंकशाफ्ट से जुड़े एक खास रैटचेट गियर को तेजी से घुमाता है. इस घूमने की प्रक्रिया से इंजन के अंदर मौजूद पिस्टन ऊपर-नीचे गति करता है और सिलेंडर में मौजूद फ्यूल कंप्रेस होकर चिंगारी के संपर्क में आता है. जैसे ही ईंधन में ब्लास्ट होता है, इंजन अपने आप चालू हो जाता है. इस सिस्टम की सबसे बड़ी खूबी इसका रैटचेट गियर है, जो इंजन स्टार्ट होते ही किक लीवर को फ्री कर देता है ताकि चलती बाइक में पैडल अपने आप न घूमने लगे. कम्यूटर और बजट बाइक्स में आज भी इसे सबसे भरोसेमंद बैकअप माना जाता है.

बटन दबाते ही चालू होने वाले इलेक्ट्रिक स्टार्ट का इनसाइड साइंस

इलेक्ट्रिक स्टार्ट पूरी तरह से एक इलेक्ट्रो-मैकेनिकल सिस्टम है, जो आपके वाहन की बैटरी पर निर्भर करता है. जब आप हैंडल पर लगे स्टार्ट बटन को दबाते हैं, तो बैटरी से भारी मात्रा में करंट निकलकर सीधे स्टार्टर मोटर में जाता है. इस मोटर के अंदर तांबे के तारों की सैकड़ों-हजारों वाइंडिंग होती है, जो करंट मिलते ही एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र (मैग्नेटिक फील्ड) बनाती हैं. इस चुंबकीय शक्ति से मोटर का गियर (रोटर) बाहर की तरफ निकलता है और इंजन के रिंग गियर से मिलकर उसे तेजी से घुमा देता है. जैसे ही इंजन स्टार्ट होता है और आप बटन छोड़ते हैं, यह रोटर तुरंत पीछे हट जाता है. यह पूरी प्रक्रिया महज कुछ सेकेंड्स में बिना किसी शारीरिक मेहनत के पूरी हो जाती है.

भारी बारिश और कड़ाके की ठंड: दोनों सिस्टम्स की सबसे बड़ी कमजोरी

सुविधाजनक होने के बावजूद इन दोनों तकनीकों की अपनी कुछ सीमाएं और कमजोरियां हैं. किक स्टार्ट की सबसे बड़ी समस्या यह है कि कड़ाके की ठंड में या लंबे समय तक वाहन खड़ा रहने पर यह आसानी से स्टार्ट नहीं होता और राइडर को शारीरिक रूप से थका देता है. वहीं दूसरी ओर, इलेक्ट्रिक स्टार्ट का सबसे बड़ा दुश्मन पानी और अत्यधिक ठंड है. अगर भारी बारिश या जलभराव के कारण बाइक का इलेक्ट्रिकल सिस्टम गीला हो जाए, तो शॉर्ट सर्किट का खतरा बढ़ जाता है और बाइक पूरी तरह ठप हो सकती है. इसके अलावा, अत्यधिक ठंडी जगहों पर बैटरियां अक्सर फ्रीज हो जाती हैं या उनका वोल्टेज गिर जाता है, जिससे स्टार्टर मोटर को पर्याप्त क्रैंकिंग एम्प्स (पावर) नहीं मिल पाती और सेल्फ स्टार्ट काम करना बंद कर देता है.

अगर रास्ते में बैटरी हो जाए पूरी तरह डेड, तो क्या हैं आपके पास विकल्प?

बिना किक वाली आधुनिक बाइक के साथ सफर करते समय अगर बीच रास्ते में बैटरी पूरी तरह डिस्चार्ज हो जाए, तो राइडर के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जाता है. ऐसी स्थिति में वाहन को दोबारा चालू करने के दो ही मुख्य तरीके बचते हैं. पहला तरीका है ‘जंप-स्टार्ट’, जिसमें किसी दूसरी चालू गाड़ी की बैटरी से केबल जोड़कर आपकी बाइक को शुरुआती पावर दी जाती है. दूसरा और सबसे व्यावहारिक तरीका है ‘पुश-स्टार्ट’ या धक्का मारना, जो केवल मैनुअल गियरबॉक्स वाली बाइक्स में ही संभव है. इसमें बाइक को दूसरे गियर में डालकर, क्लच दबाकर तेजी से धक्का दिया जाता है और गति पकड़ते ही क्लच छोड़ने पर पहियों का मोमेंटम इंजन को बैकवर्ड घुमाकर स्टार्ट कर देता है.

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By Rajeev Kumar

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