Xi Jinping India Visit: 7 साल बाद भारत लौटे शी जिनपिंग, मोदी-शी रिश्तों में क्या बदला?

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत लौटे हैं. लेकिन इस वापसी को सिर्फ एक हाई-प्रोफाइल कूटनीतिक मुलाकात के तौर पर देखना शायद पूरी तस्वीर नहीं बताता. 2019 के मामल्लपुरम से 2026 के भारत मंडपम तक भारत और चीन के रिश्ते ने एक लंबा और कठिन सफर तय किया है.

कभी नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की अनौपचारिक मुलाकातों में व्यक्तिगत संवाद और राजनीतिक समझ की उम्मीद दिखाई देती थी. लेकिन 2020 के सीमा संकट ने उस उम्मीद को गहरी चोट पहुंचाई. इसके बाद Line of Actual Control यानी LAC भारत-चीन संबंधों में भरोसे का सबसे बड़ा पैमाना बन गया.

ऐसे में शी जिनपिंग की भारत यात्रा का असली सवाल यह नहीं है कि क्या भारत और चीन फिर दोस्त बन रहे हैं?

सवाल इससे ज्यादा व्यावहारिक है-

क्या दोनों देश अपने मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे के साथ अधिक predictable तरीके से प्रतिस्पर्धा करना सीख रहे हैं?

विदेश नीति विश्लेषक, कूटनीति और रणनीतिक मामलों की जानकार सामंथा करमाकर से समझें.

Samantha Karmakar - Foreign policy analyst , diplomacy & strategic affairs

1. Mamallapuram से Bharat Mandapam तक कितनी बदल गई कहानी?

2019 में तमिलनाडु के मामल्लपुरम में मोदी और शी की अनौपचारिक मुलाकात को भारत-चीन संबंधों में एक खास क्षण के रूप में देखा गया था.

समुद्र किनारे ऐतिहासिक स्मारकों की पृष्ठभूमि में हुई उस मुलाकात का संदेश था कि दोनों देश अपने विवादों के बावजूद संवाद के लिए राजनीतिक जगह बना सकते हैं.

उस समय उम्मीद थी कि Modi-Xi diplomacy सीमा विवाद, व्यापार और अन्य मतभेदों को मैनेज करने का रास्ता निकाल सकती है.

लेकिन 2020 के सीमा संकट ने पूरी तस्वीर बदल दी.
LAC पर सैन्य तनाव ने यह साफ कर दिया कि भारत-चीन संबंधों में आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग की कोई भी बात सीमा पर शांति से अलग नहीं की जा सकती.

यही वजह है कि आज भारत और चीन के बीच बातचीत का अर्थ 2019 जैसा विश्वास नहीं है.

अब बातचीत का पहला उद्देश्य है- तनाव को नियंत्रित करना.

2. 2020 के बाद भारत-चीन रिश्ते का सबसे बड़ा बदलाव क्या है?

भारत-चीन संबंधों में सबसे बड़ा बदलाव शायद यही है कि अब border peace ही bilateral trust की बुनियादी शर्त बन चुका है.

पहले दोनों देश यह कोशिश करते थे कि सीमा विवाद को बाकी रिश्तों से अलग रखा जाए.

लेकिन 2020 के बाद भारत का दृष्टिकोण काफी स्पष्ट रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना रिश्तों को सामान्य गति से आगे बढ़ाना मुश्किल होगा.
इसका असर व्यापार, निवेश, लोगों के बीच संपर्क और रणनीतिक संवाद पर भी पड़ा.

इसलिए शी जिनपिंग की वर्तमान भारत यात्रा को 'normalisation' कहना जल्दबाजी होगी.

यह ज्यादा सही तरीके से diplomatic recalibration यानी कूटनीतिक पुनर्संतुलन की कोशिश है.

मतलब साफ है-

मतभेद खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन उन्हें manage करने की कोशिश फिर शुरू हुई है.

और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार यही पहला कदम होता है.

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3. BRICS क्यों बना भारत-चीन बातचीत का अहम मंच?

यहां BRICS की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है.

भारत और चीन एशिया में रणनीतिक प्रतिस्पर्धी हैं. दोनों के बीच सीमा विवाद है, इंडो-पैसिफिक को लेकर दृष्टिकोण अलग हैं और वैश्विक राजनीति में दोनों की प्राथमिकताएं हमेशा एक जैसी नहीं होतीं.

फिर भी दोनों देश BRICS जैसे मंच पर साथ बैठते हैं.

क्यों?

क्योंकि BRICS केवल भारत-चीन संबंधों का मंच नहीं है. यह Global South की बदलती राजनीतिक और आर्थिक आवाज का भी एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है.

भारत के लिए यहां एक महत्वपूर्ण diplomatic proposition सामने आता है-

बहुपक्षीय सहयोग का मतलब द्विपक्षीय समझौता नहीं है.

भारत चीन के साथ BRICS में सहयोग कर सकता है और साथ ही सीमा, सुरक्षा तथा रणनीतिक मामलों पर अपनी कठोर स्थिति बनाए रख सकता है.

यही भारत की strategic autonomy की मूल भावना है.

भारत का संदेश यह हो सकता है कि—

प्रतिस्पर्धा और संवाद एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं.

सांकेतिक तस्वीर (PC : AI)

4. चीन के लिए भारत से रिश्ते सुधारना क्यों उपयोगी हो सकता है?

भारत के लिए संवाद जरूरी है, लेकिन चीन के लिए भी भारत के साथ कम तनावपूर्ण संबंधों के अपने रणनीतिक फायदे हैं.

आज चीन को अमेरिका के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा, Indo-Pacific में बदलते समीकरण और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ रहा है.
ऐसे समय में भारत के साथ लगातार टकराव चीन के लिए एक अतिरिक्त strategic pressure बन सकता है.

अगर भारत-चीन संबंध अधिक predictable होते हैं तो बीजिंग को अपनी रणनीतिक ऊर्जा दूसरे मोर्चों पर केंद्रित करने के लिए अधिक flexibility मिल सकती है.

इसका मतलब यह नहीं कि चीन भारत की सभी चिंताओं को स्वीकार कर लेगा.

बल्कि यह है कि दोनों देश confrontation की लागत को समझते हुए competition को manage करने की कोशिश कर सकते हैं.

तो क्या मोदी और शी के रिश्ते फिर पुराने दौर में लौट रहे हैं?

शायद नहीं.

और शायद यही इस मुलाकात की सबसे महत्वपूर्ण बात है.

भारत-चीन संबंधों को 2019 की personal chemistry वाली कूटनीति में वापस ले जाना अब संभव भी नहीं है और शायद जरूरी भी नहीं.

2020 ने दोनों देशों को यह सिखाया है कि व्यक्तिगत संवाद महत्वपूर्ण है, लेकिन वह संस्थागत भरोसे का विकल्प नहीं हो सकता.

भारत के लिए कुछ बुनियादी मुद्दे स्पष्ट रहेंगे—

  • LAC पर शांति और स्थिरता
  • संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान
  • आर्थिक संबंधों में reciprocity
  • सैन्य तनाव को रोकने के लिए विश्वसनीय व्यवस्था
  • राजनीतिक और रणनीतिक संवाद की निरंतरता

यानी dialogue जरूरी है, लेकिन dialogue अपने आप में trust नहीं है.

भरोसा तभी बनेगा जब बातचीत के साथ credible commitments भी दिखाई दें.

BRICS नेताओं की ग्रुप फोटो (PC : ANI)

Mamallapuram से Bharat Mandapam: एक प्रतीकात्मक यात्रा

2019 का Mamallapuram उम्मीद का प्रतीक था.

2026 का Bharat Mandapam वास्तविकता का.

तब सवाल था—क्या मोदी और शी व्यक्तिगत संवाद से रिश्तों की मुश्किलें कम कर सकते हैं?

आज सवाल बदल चुका है—

क्या भारत और चीन एक-दूसरे पर पूरी तरह भरोसा किए बिना भी एक स्थिर संबंध बना सकते हैं?

यही बदलती एशियाई राजनीति की असली चुनौती है.

भारत और चीन शायद फिर कभी वैसी 'गर्मजोशी' वाली तस्वीरें न बनाएं जैसी 2019 में दिखी थीं.

लेकिन अगर वे सीमा पर शांति, संवाद और पारस्परिक restraint को संस्थागत रूप दे पाते हैं, तो यह भी कम महत्वपूर्ण उपलब्धि नहीं होगी.

क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी-कभी स्थायी दोस्ती से ज्यादा महत्वपूर्ण स्थायी predictability होती है.

और भारत-चीन संबंध शायद अब उसी दिशा में बढ़ रहे हैं.

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लेखक के बारे में

By अचल प्रियदर्शी

अचल प्रियदर्शी अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, Geopolitical Analyst, UPSC Educator और 33 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं (जैसे Pratiyogita Darpan) में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. Winning Bengal: Inside West Bengal’s Electoral War of 2026 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  4. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  5. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  6. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  7. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  8. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  9. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  10. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  11. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  12. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

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