AI से बनी इस देश की एआई पॉलिसी 16 दिन में ही रद्द, फर्जी जर्नल और रेफरेंस से हुआ खुलासा

South Africa AI Policy: दक्षिण अफ्रीका ने पहली एआई पॉलिसी को मजह 16 दिन में ही रद्द कर दिया. एआई ने मनगढ़ंत जर्नल्स और फर्जी रेफरेंस दे दिया. जब खुलासा हुआ तो सरकार को इसे वापस लेना पड़ा.

South Africa AI Policy: तकनीक हर दौर में बदलती है. हाइटेक साइंस के इस दौर में तो ऐसा लगता है, जैसे हर महीने कुछ न कुछ नया आ रहा है. ऐसा ही नया टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट है एआई. यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस. हर देश इसमें अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने में लगा है. अमेरिका, चीन, यूरोप, भारत सभी पूरा जोर लगा रहे हैं. दक्षिण अफ्रीका ने भी कोशिश की. लेकिन उसने अपनी पहली ड्राफ्ट राष्ट्रीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) नीति को प्रकाशित होने के केवल 16 दिनों में ही वापस ले लिया है. क्यों? क्योंकि जांच में पता चला कि दस्तावेज के कुछ हिस्सों में फर्जी और एआई-जेनरेटेड एकेडमिक रेफरेंस शामिल थे. यानी देश की एआई पॉलिसी भी एआई से जेनरेट की गई. 

दक्षिण अफ्रीका के कम्यूनिकेशन एंड डिजिटल टेक्नोलॉजी विभाग ने 10 अप्रैल को ‘ड्राफ्ट साउथ अफ्रीका नेशनल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पॉलिसी’ को सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए जारी किया था. इसमें देश को एआई इनोवेशन में उभरते नेता के रूप में पेश किया गया था. लेकिन 16 दिनों बाद ही इस दस्तावेज को हटा लिया गया.

पॉलिसी में क्या था?

इस ड्राफ्ट नीति का उद्देश्य एक व्यापक AI शासन ढांचा तैयार करना था, जिसमें एक राष्ट्रीय AI आयोग, एथिक्स बोर्ड और नियामक प्राधिकरण के गठन के प्रस्ताव शामिल थे. इसमें निजी क्षेत्र में AI इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश को बढ़ावा देने के लिए टैक्स इंसेंटिव, ग्रांट और सब्सिडी की भी रूपरेखा दी गई थी, साथ ही तकनीक से जुड़े नैतिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों को भी संबोधित किया गया था.   

एआई ने ‘हैलुसिनेट’ किया

देश के संचार मंत्री सॉली मलात्सी ने पुष्टि की कि पॉलिसी में दिए गए 67 रेफरेंस में से कम से कम छह हैलुसिनेटेड थे. यानी वे या तो ऐसे एकेडमिक जर्नल्स की ओर इशारा करते थे जो अस्तित्व में ही नहीं हैं, या फिर ऐसे लेखों की ओर जो किसी वैलिड पब्लिकेशन में कभी प्रकाशित ही नहीं हुए. इसकी वजह से विश्वसनीयता और शासन को लेकर गंभीर चिंताएं उठीं. 

कैसे खुला मामला?

यह मामला तब सामने आया जब एक दक्षिण अफ्रीकी ब्रॉडकास्टर की जांच में संदर्भों में गड़बड़ी उजागर हुई. ब्रिटिश अखबार ‘द इंडिपेंडेंट’ की रिपोर्ट के अनुसार, साउथ अफ्रीकन जर्नल ऑफ फिलॉसफी, एआई एंड सोसाइटी और जर्नल ऑफ एथिक्स एंड सोशल फिलॉसफी जैसे प्रतिष्ठित जर्नल्स के संपादकों ने पुष्टि की कि जिन लेखों का हवाला दिया गया था, वे अस्तित्व में ही नहीं हैं.  

एआई ने क्या किया?

फर्जी रेफरेंस संभवतः चैट जीपीटी या गूगल जैमिनी जैसे टूल्स के जरिए जेनरेट किए गए थे. AI द्वारा बनाए गए इन संदर्भों ने न केवल स्रोत गढ़े, बल्कि विश्वसनीय जर्नल्स और शोधकर्ताओं के नाम से गलत तरीके से शोध को जोड़कर एक झूठी विश्वसनीयता का भ्रम पैदा किया. इस घटना ने साबित किया है कि जेनरेटिव AI की वजह से गलत सूचना, डीपफेक और डिजिटल पहचान के दुरुपयोग जैसे व्यापक जोखिम हैं.

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दक्षिण अफ्रीका की साख को लगा झटका

मलात्सी ने कहा, ‘सबसे संभावित कारण यह है कि AI-जनित संदर्भों को बिना उचित सत्यापन के शामिल कर लिया गया. ऐसा नहीं होना चाहिए था.’ उन्होंने यह भी कहा कि इस चूक ने दक्षिण अफ्रीका की साख, विश्वसनीयता  को प्रभावित किया है. इस घटना ने दक्षिण अफ्रीका की एआई पॉलिसी वाली योजनाओं को झटका दिया है.

मंत्री ने माना कि यह समस्या केवल तकनीकी गलती नहीं, बल्कि मानव निगरानी की विफलता भी दर्शाती है. उन्होंने कहा, ‘यह अस्वीकार्य चूक साबित करती है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के उपयोग पर सतर्क मानवीय निगरानी कितनी आवश्यक है.’ उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इसके लिए जवाबदेही तय की जाएगी. सरकार अब इस ड्राफ्ट नीति को संशोधित कर फिर से सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी करने की तैयारी कर रही है.

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By Anant narayan shukla

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