Pakistan Judge Fake LLB Degree: पाकिस्तान की न्यायपालिका (जूडिशरी) में एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है. सोमवार, 23 फरवरी 2026 को इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक 116 पन्नों का फैसला सुनाते हुए अपने ही एक जज, जस्टिस तारिक महमूद जहांगीरी को उनके पद से हटा दिया है. कोर्ट ने साफ कहा कि उनकी नियुक्ति पूरी तरह से अवैध थी क्योंकि उनके पास कानून की वैलिड (असली) डिग्री ही नहीं थी.
30 साल तक फर्जीवाड़े के सहारे चलता रहा करियर
‘डॉन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, चीफ जस्टिस सरदार मोहम्मद सरफराज डोगर और जस्टिस मोहम्मद आजम खान की बेंच ने यह फैसला सुनाया है. कोर्ट ने बताया कि जहांगीरी ने लगभग 30 साल तक वकालत और जज के तौर पर काम किया. उन्हें 30 दिसंबर 2020 को इस्लामाबाद हाई कोर्ट का जज बनाया गया था, लेकिन उनकी एलएलबी (LLB) की डिग्री शुरू से ही फर्जी थी. कराची यूनिवर्सिटी के रिकॉर्ड्स से पता चला है कि उन्होंने दूसरे स्टूडेंट्स के नाम और नंबर का इस्तेमाल करके धोखाधड़ी की थी.
कैसे पकड़ी गई जज साहब की चालाकी?
यूनिवर्सिटी के रिकॉर्ड्स के अनुसार, जहांगीरी का फर्जीवाड़ा कुछ इस तरह था:
- 1988: इन्होंने फर्जी एनरोलमेंट नंबर से एलएलबी पार्ट-1 का एग्जाम दिया.
- 1989: यूनिवर्सिटी ने उन्हें चैटिंग करते हुए पकड़ा और 3 साल के लिए बैन कर दिया.
- 1990: सजा काटने के बजाय उन्होंने ‘तारिक जहांगीरी’ नाम से दोबारा एग्जाम दिया. इस बार उन्होंने इम्तियाज अहमद नाम के छात्र का एनरोलमेंट नंबर इस्तेमाल किया.
- पार्ट-2 एग्जाम: बाद में उन्होंने अपने असली नाम से पार्ट-2 का एग्जाम दिया, लेकिन एनरोलमेंट नंबर फिर बदल दिया.
यूनिवर्सिटी के एग्जामिनेशन कंट्रोलर ने कोर्ट को बताया कि एक कोर्स के लिए एक ही नंबर मिलता है, दो नंबर होना नामुमकिन है. वहीं, गवर्नमेंट इस्लामिया लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल ने भी कन्फर्म किया कि जहांगीरी ने वहां कभी एडमिशन ही नहीं लिया था.
कोर्ट में बहानेबाजी और ‘बेंच हंटिंग’ की कोशिश
जब यह मामला 2024 में सामने आया, तो हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 में ही उन्हें काम करने से रोक दिया था. कोर्ट ने कहा कि जहांगीरी को अपनी सफाई देने के कई मौके दिए गए, लेकिन उन्होंने असली दस्तावेज दिखाने के बजाय केस को टालने की कोशिश की. उन्होंने चीफ जस्टिस को केस से हटाने और फुल कोर्ट बनाने जैसी मांगें रखीं, जिसे कोर्ट ने ‘बेंच हंटिंग’ (अपनी पसंद के जज चुनना) करार दिया.
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क्या कहती है कानूनी बारीकी?
रिपोर्ट के अनुसार, जहांगीरी ने दलील दी थी कि उनका मामला सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल (SJC) में जाना चाहिए. लेकिन हाईकोर्ट ने ‘मालिक असद अली बनाम फेडरेशन ऑफ पाकिस्तान’ केस का हवाला देते हुए कहा कि SJC जज के काम और व्यवहार की जांच करती है, लेकिन अगर किसी की नियुक्ति ही फर्जी डिग्री पर हुई हो, तो हाईकोर्ट उसे रद्द कर सकता है. कोर्ट ने दो टूक कहा कि जो चीज शुरू से ही गलत है, उसे बाद में सही नहीं ठहराया जा सकता.
हालांकि, जहांगीरी ने इन फैसलों को फेडरल कॉन्स्टिट्यूशनल कोर्ट में चुनौती दी है. उनका तर्क है कि कराची यूनिवर्सिटी ने उनकी डिग्री रद्द करने का जो फैसला लिया था, उस पर सिंध हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी, जिसे नजरअंदाज किया गया.
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