Nobel Prize 2022 : स्वीडिश वैज्ञानिक Svante Paabo को मिला मेडिसीन का नोबेल पुरस्कार

स्वंते पाबो ने आज के संदर्भ में यह जानने की कोशिश की जीन के प्रवाह की आज के समय में प्रासंगिकता क्या है. इसके लिए उन्होंने यह जानना चाहा कि हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम किसी भी तरह के संक्रमण पर कैसे प्रतिक्रिया देता है.

Nobel Prize 2022 : स्वीडिश वैज्ञानिक स्वंते पाबो (Svante Paabo) को मेडिसीन के क्षेत्र में विश्व का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार नोबेल पुरस्कार दिये जाने की घोषणा की गयी है. स्वंते पाबो ने मानवीय शरीर में जीन के प्रवाह को लेकर शोथ किया है.

इम्यून सिस्टम संक्रमण पर कैसे देता है प्रतिक्रिया

स्वंते पाबो ने आज के संदर्भ में यह जानने की कोशिश की जीन के प्रवाह की आज के समय में प्रासंगिकता क्या है. इसके लिए उन्होंने यह जानना चाहा कि हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम किसी भी तरह के संक्रमण पर कैसे प्रतिक्रिया देता है.


काॅफी का आनंद लेते हुए मिली पुरस्कार की जानकारी 

स्वंते पाबो की पत्नी ने इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्‌वीट किया है कि पाबो को यह सूचना एक कप काॅफी का आनंद लेते हुए मिली. पहले तो वे हैरान रह गये, लेकिन उसके बाद उन्होंने यह खबर मुझसे शेयर की. निएंडरथल के जीनोम का अनुक्रमण, जो वर्तमान मानवों का एक विलुप्त रिश्तेदार है. पाबो ने एक विलुप्त होमिनिन, डेनिसोवा की सनसनीखेज खोज भी की.

पुरस्कार में करीब नौ लाख अमेरिकी डॉलर नकद दिया जायेगा

स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम स्थित करोलिंस्का संस्थान में सोमवार को नोबेल पुरस्कार समिति ने आज पुरस्कार दिये जाने की घोषणा की. पुरस्कार में एक करोड़ स्वीडिश क्रोनोर (करीब नौ लाख अमेरिकी डॉलर) की नकद राशि प्रदान की जायेगी. यह पुरस्कार नोबेल पुरस्कार विजेताओं को 10 दिसंबर को दिया जायेगा. यह राशि पुरस्कार की स्थापना करने वाले स्वीडन के आविष्कारक अल्फ्रेड नोबल द्वारा छोड़ी गई वसीयत से दी जाती है.

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लेखक के बारे में

Published by: Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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