नेपाल से मनोज गुप्ता की रिपोर्ट
Nepal Flood : पर्याप्त शवगृह (मॉर्च्युरी) की सुविधा न होने से शवों के सुरक्षित रख-रखाच की चुनौती बढ़ गयी है. चितवन के स्वास्थ्य संस्थानों में अधिकतम 50 शव रखने की ही क्षमता है, जबकि बरामद शवों की संख्या इससे कई गुना अधिक है.
त्रिवि शिक्षण अस्पताल के वरिष्ठ फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ गोपाल चौधरी के अनुसार, "इतनी बड़ी प्राकृतिक आपदा के दौरान शव मिलते ही जल्दबाजी में अंतिम संस्कार नहीं किया जाना चाहिए. शव की पहचान और उससे जुड़े सभी साक्ष्यों को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है. प्रत्येक शव को अलग नंबर देकर टैग किया जाना चाहिए. इसके साथ ही शव मिलने का स्थान, समय, कपड़े, गहने, शरीर के विशेष पहचान चिह्न और फोटो सहित संपूर्ण विवरण दर्ज किया जाना चाहिए."
रेफ्रिजरेशन सुविधा वाले कंटेनरों को भी अस्थायी शव भंडारण केंद्र बनाया जा सकता है
विशेषज्ञों का सुझाव है कि बड़ी संख्या में शव मिलने पर अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थानों पर वैज्ञानिक तरीके से शवों को दफनाकर संरक्षित किया जा सकता है. इसके अलावा, रेफ्रिजरेशन सुविधा वाले बड़े कंटेनरों को भी अस्थायी शव भंडारण केंद्र के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां एक कंटेनर में लगभग 50 शव रखे जा सकते हैं.
डिजास्टर विक्टिम आइडेंटिफिकेशन टीम का गठन जरूरी
फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ हरिहर वस्ती ने कहा कि इतनी बड़ी आपदा में शव प्रबंधन का काम किसी एक अस्पताल या चिकित्सक के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. इसके लिए तत्काल डिजास्टर विक्टिम आइडेंटिफिकेशन टीम गठित की जानी चाहिए, जिसमें फोरेंसिक डॉक्टर, पुलिस, दंत चिकित्सक (डेंटल एक्सपर्ट), फिंगरप्रिंट और डीएनए विशेषज्ञ शामिल हों. जिन शवों की स्थिति ठीक है, उनकी पहचान परिजनों, कपड़ों, गहनों या टैटू के आधार पर की जा सकती है. हालांकि, अत्यधिक क्षत-विक्षत या सड़े-गले शवों की पहचान के लिए फिंगरप्रिंट, दांतों की जांच और डीएनए परीक्षण अनिवार्य होना चाहिए. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बिना वैज्ञानिक पुष्टि के परिजनों को शव सौंपने या जल्दबाजी में अंतिम संस्कार करने से गलत पहचान का बड़ा खतरा रहता है. बाढ़ के शव चितवन से लेकर नवलपरासी तक के विस्तृत क्षेत्रों में मिल रहे हैं. ऐसे में केंद्र सरकार को स्थानीय और प्रांतीय सरकारों के साथ समन्वय बनाकर तुरंत अस्थायी शव भंडारण केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता है.
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