मक्का पर ड्रोन अलर्ट ने क्यों जगाई 1979 की डरावनी याद? जब 600 हथियारबंद लोगों ने ग्रैंड मस्जिद पर कब्जा कर लिया था

15 सितंबर 2026 को मक्का के आसमान में ड्रोन ने भले ही कुछ मिनटों के लिए खतरे की घंटी बजाई हो, लेकिन इस घटना ने सऊदी अरब की एक ऐसी ऐतिहासिक स्मृति को फिर जगा दिया, जिसे वह शायद कभी भूल नहीं सकता. 1979 में करीब 600 हथियारबंद इस्लामी कट्टरपंथियों ने दुनिया की सबसे पवित्र मस्जिद पर कब्जा कर हजारों लोगों को बंधक बना लिया था. यह सिर्फ एक आतंकी हमला नहीं था. इसने सऊदी सत्ता, इस्लामी राजनीति और आगे चलकर अल-कायदा जैसी जिहादी विचारधारा को प्रभावित किया.

15 सितंबर को सऊदी अरब ने पहली बार मक्का के ऊपर हवाई चेतावनी जारी की. सऊदी अधिकारियों के मुताबिक, एक संदिग्ध ड्रोन को मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले मार गिराया गया. रियाद ने इसके लिए यमन के हूती विद्रोहियों को जिम्मेदार ठहराया. हूती पक्ष ने हालांकि मक्का या किसी इस्लामी पवित्र स्थल को निशाना बनाने की बात से इनकार किया.

अलर्ट कुछ ही देर में हटा लिया गया. कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ.

लेकिन मक्का जैसी जगह पर किसी संभावित हमले का अर्थ सिर्फ सैन्य खतरा नहीं होता. यह उस स्मृति को भी छूता है जब 1979 में ग्रैंड मस्जिद खुद हथियारबंद विद्रोहियों के कब्जे में चली गई थी.

1979: जब नमाज के बाद गोलियां चलने लगीं

20 नवंबर 1979.

इस्लामी कैलेंडर के नए साल का पहला दिन था. सुबह की नमाज के लिए मक्का की ग्रैंड मस्जिद में हजारों लोग जमा थे. कुछ अनुमानों के मुताबिक वहां करीब 50,000 से लेकर 100,000 तक श्रद्धालु मौजूद थे.

नमाज खत्म हुई ही थी कि अचानक गोलियों की आवाज सुनाई दी.

एक व्यक्ति ने मस्जिद के लाउडस्पीकर का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया.

वह था जुहैमैन अल-उतैबी, करीब 40 वर्षीय पूर्व सऊदी नेशनल गार्ड कॉर्पोरल और धार्मिक उपदेशक.

उसने घोषणा की कि जिस 'महदी' के आने की भविष्यवाणी की गई है, वह आ चुका है. उसके साथियों के अनुसार वह महदी उसका बहनोई मुहम्मद अब्दुल्लाह अल-कहतानी था.

यह कोई अचानक किया गया हमला नहीं था. जुहैमैन और उसके समर्थकों का मानना था कि सऊदी राजपरिवार भ्रष्ट हो चुका है और इस्लाम के सबसे पवित्र स्थल का संरक्षक बने रहने का नैतिक अधिकार खो चुका है.

उनका लक्ष्य केवल मस्जिद पर कब्जा करना नहीं था. वे सऊदी राजसत्ता को चुनौती देना चाहते थे.

और इसके लिए उन्होंने वह जगह चुनी, जहां हथियार उठाना ही धार्मिक रूप से वर्जित माना जाता था.

मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर हथियारबंद कब्जा 40 साल के पूर्व सऊदी नेशनल गार्ड कॉर्पोरल और धार्मिक उपदेशक जुहैमान अल-उतैबी ने किया था। File Image/AFP

इतनी बड़ी मस्जिद में भागना इतना मुश्किल क्यों था?

ग्रैंड मस्जिद कोई सामान्य इमारत नहीं थी. विशाल खुले प्रांगण, चारों ओर बने गलियारे, मीनारें और भूमिगत कमरों का जटिल नेटवर्क इसे लगभग एक विशाल किले जैसा बना देता था.

जुहैमैन के करीब 600 हथियारबंद समर्थक अलग-अलग हिस्सों में फैल गए.
उन्होंने दरवाजे बंद कर दिए.
हथियारबंद लोगों ने पहरेदारों को काबू में कर लिया.
और हजारों श्रद्धालु अचानक बंधक बन गए.

यानी जिस जगह पर लोग अल्लाह के सामने इबादत करने आए थे, वही जगह कुछ ही मिनटों में हथियारबंद विद्रोहियों का गढ़ बन गई.

यही वजह थी कि सऊदी सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया भी असमंजस से भरी रही.

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सऊदी सेना के सामने सबसे बड़ी मुश्किल क्या थी?

समस्या सिर्फ यह नहीं थी कि विद्रोहियों के पास हथियार थे.

समस्या यह थी कि वे मक्का की ग्रैंड मस्जिद के अंदर थे.

इस्लामी परंपरा में हरम की सीमा के भीतर हिंसा और हथियारों को लेकर बेहद कड़े धार्मिक निषेध हैं. ऐसे में सऊदी सैनिकों के सामने असाधारण स्थिति थी.

राज्य को मस्जिद में सैन्य कार्रवाई करने के लिए धार्मिक वैधता चाहिए थी.

सऊदी नेतृत्व ने प्रमुख धार्मिक विद्वानों से फतवा हासिल किया. इसके बाद सेना और सुरक्षा बलों को कार्रवाई की अनुमति मिली.

पहला हमला बुरी तरह विफल रहा.

विद्रोहियों के पास बेहतर हथियार और रणनीतिक स्थिति थी. उन्होंने मस्जिद की ऊंची जगहों और मीनारों से सुरक्षा बलों पर गोलीबारी की.

इसके बाद सऊदी नेशनल गार्ड, सेना, विशेष बल और बख्तरबंद इकाइयां अभियान में उतारी गईं.

लेकिन लड़ाई खत्म नहीं हुई.

सऊदी सैनिक मक्का की ग्रैंड मस्जिद के भूमिगत गलियारे में आगे बढ़ते हुए। चित्र साभार: विकिपीडिया

मस्जिद के नीचे था एक और 'किला'

विद्रोही धीरे-धीरे मस्जिद के भूमिगत हिस्से में चले गए.

यहां कमरों, गलियारों और सुरंगों का विशाल नेटवर्क था.
यही वह हिस्सा था जिसने सऊदी सुरक्षा बलों के अभियान को बेहद मुश्किल बना दिया.
लगभग दो सप्ताह तक संघर्ष चलता रहा.
मस्जिद को भारी नुकसान पहुंचा। बड़ी संख्या में लोग मारे गए या घायल हुए.

आखिरकार सऊदी सरकार ने विदेशी विशेषज्ञता भी ली. फ्रांस से विशेषज्ञों की एक छोटी टीम ने भूमिगत हिस्से से विद्रोहियों को बाहर निकालने की रणनीति तैयार करने में मदद की.

भूमिगत कमरों में गैस का इस्तेमाल किया गया और धीरे-धीरे विद्रोहियों की प्रतिरोध क्षमता टूटने लगी.

5 दिसंबर 1979 को जुहैमैन और उसके बचे हुए साथियों ने आत्मसमर्पण कर दिया.

फिर क्या हुआ?

करीब एक महीने बाद, 9 जनवरी 1980 को जुहैमैन और उसके 62 साथियों को सऊदी अरब के अलग-अलग शहरों में सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई.

मक्का और मदीना जैसे पवित्र शहर भी उन स्थानों में शामिल थे जहां इन फांसी की सजा को अंजाम दिया गया.

लेकिन विद्रोहियों की मौत के साथ कहानी खत्म नहीं हुई.

असल में, यहीं से इसका दूसरा अध्याय शुरू हुआ.

1979 ने सऊदी अरब को कैसे बदल दिया?

ग्रैंड मस्जिद पर कब्जा सऊदी राजशाही के लिए केवल सुरक्षा संकट नहीं था. यह उसकी धार्मिक वैधता पर सीधा हमला था.

सऊदी शासक स्वयं को इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थलों—मक्का और मदीना—का संरक्षक मानते थे.

ऐसे में उन्हीं के शासन में हथियारबंद धार्मिक विद्रोहियों का ग्रैंड मस्जिद पर कब्जा कर लेना एक गहरी राजनीतिक और वैचारिक चुनौती थी.

राजशाही ने इसका जवाब अपने शासन को और अधिक धार्मिक रूप से रूढ़िवादी बनाकर दिया.

सामाजिक जीवन पर धार्मिक निगरानी बढ़ी. नैतिक पुलिस की भूमिका मजबूत हुई. सार्वजनिक जीवन में रूढ़िवादी धार्मिक मानदंडों का प्रभाव बढ़ा.

यानी एक विडंबना पैदा हुई.

कट्टरपंथियों ने राजशाही को चुनौती दी, लेकिन उस चुनौती के बाद राज्य ने कुछ मायनों में समाज पर धार्मिक नियंत्रण और मजबूत कर दिया.

यही वह दौर था जिसने आने वाले वर्षों के सऊदी समाज और पश्चिम एशिया की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया.

ईरान भी इस कहानी में क्यों आता है?

1979 अपने आप में पश्चिम एशिया के लिए असाधारण वर्ष था.

ईरान में इस्लामी क्रांति हो चुकी थी. अयातुल्लाह खुमैनी सत्ता में आ चुके थे.

ऐसे माहौल में जब मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर हमला हुआ, दुनिया के कई हिस्सों में शुरुआती अनुमान यह था कि इसके पीछे ईरान के शिया क्रांतिकारी हो सकते हैं.

अमेरिका में भी शुरुआती प्रतिक्रिया इसी दिशा में गई.

खुमैनी ने आरोप उल्टा अमेरिका और इजरायल पर डाल दिया.

इस गलत सूचना और अफवाहों का परिणाम बेहद हिंसक हुआ.

पाकिस्तान में अमेरिकी दूतावास पर भीड़ ने हमला कर दिया और उसे जला दिया. अमेरिकी और पाकिस्तानी कर्मियों की मौत हुई। मुस्लिम दुनिया के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए.

बाद में स्पष्ट हुआ कि मक्का पर कब्जा करने वाले लोग ईरानी शिया क्रांतिकारी नहीं, बल्कि सुन्नी इस्लामी कट्टरपंथी थे.

लेकिन तब तक 1979 की एक और दरार गहरी हो चुकी थी—सऊदी अरब बनाम ईरान.

और इसी कहानी में एक युवा ओसामा भी था

1979 के मक्का विद्रोह का सबसे दिलचस्प और दूरगामी असर शायद उस युवा पर पड़ा, जिसका नाम तब दुनिया लगभग जानती भी नहीं थी.

ओसामा बिन लादेन.

उस समय वह एक युवा सऊदी था और उसके परिवार की निर्माण कंपनी सऊदी अरब के बड़े निर्माण कार्यों से जुड़ी थी.

दिलचस्प बात यह है कि ग्रैंड मस्जिद के परिसर में उस समय निर्माण कार्य भी चल रहा था और बिन लादेन परिवार की कंपनी वहां काम कर रही थी.

विद्रोहियों ने इसी निर्माण व्यवस्था का फायदा उठाकर कुछ हथियार अंदर पहुंचाए. बाद में जब सऊदी सुरक्षा बलों को भूमिगत हिस्से का नक्शा चाहिए था, तो बिन लादेन परिवार की कंपनी के पास मौजूद नक्शे उपयोगी साबित हुए.

लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण था इसका मनोवैज्ञानिक असर.

यारोस्लाव ट्रोफिमोव की जांच के मुताबिक, युवा ओसामा बिन लादेन सऊदी सरकार की सैन्य कार्रवाई से बेहद प्रभावित हुआ.

उसकी नजर में पवित्र स्थल के भीतर टैंक और भारी हथियार भेजना स्वयं एक तरह का अपमान था.

यानी जहां सऊदी राज्य इसे अपनी संप्रभुता और धार्मिक व्यवस्था बचाने की कार्रवाई मान रहा था, वहीं एक युवा ओसामा इसे हरम के अपमान के रूप में देख रहा था.

यहीं से उसके भीतर सऊदी राजशाही के प्रति वफादारी में दरार पड़ने लगी.

क्या 1979 सीधे अल-कायदा तक पहुंचता है?

यह कहना गलत होगा कि 1979 में ही अल-कायदा बन गया था.

लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि मक्का विद्रोह और बाद के वैश्विक जिहादी आंदोलन के बीच कोई संबंध नहीं था.

ट्रोफिमोव के विश्लेषण में मक्का की घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दो अलग-अलग धाराएं पहली बार एक साथ दिखाई देती हैं—

सऊदी वहाबी धार्मिक कट्टरता और मिस्र से निकली जिहादी विचारधारा.

बाद के वर्षों में अफगानिस्तान का युद्ध इन धाराओं को और मजबूत करेगा.

सोवियत संघ के खिलाफ अफगान जिहाद में अरब स्वयंसेवक जुटेंगे. ओसामा बिन लादेन उसी वातावरण में एक बड़े नेटवर्क का निर्माण करेगा.

बाद में यही नेटवर्क अल-कायदा के रूप में सामने आएगा.

इसलिए 1979 को केवल एक असफल सऊदी विद्रोह के रूप में देखना इतिहास को छोटा कर देना होगा.

यह उस वैचारिक भूगोल का शुरुआती बिंदु था जिसने अगले दो दशकों में पश्चिम एशिया से लेकर अफगानिस्तान और फिर पूरी दुनिया को प्रभावित किया.

15 सितंबर 2026 की घटना में 1979 की छाया क्यों दिखती है?

आज की परिस्थिति बिल्कुल अलग है.

1979 में मक्का के भीतर हथियारबंद लोगों ने ग्रैंड मस्जिद पर कब्जा कर लिया था.
2026 में मक्का के बाहर हवाई क्षेत्र में एक ड्रोन को रोकने की बात सामने आई.

एक घटना में जमीन पर कब्जा था, दूसरी में संभावित हवाई खतरा.

फिर भी दोनों घटनाओं के बीच एक समानता है—मक्का की सुरक्षा.

मक्का केवल सऊदी अरब का शहर नहीं है. दुनिया भर के मुसलमानों के लिए यह इस्लाम का सबसे पवित्र शहर है.

इसलिए यहां किसी भी सैन्य या आतंकी खतरे का राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव उसके वास्तविक भौतिक नुकसान से कहीं बड़ा हो सकता है.

15 सितंबर का अलर्ट कुछ मिनटों में समाप्त हो गया। लेकिन उसने यह याद जरूर दिला दिया कि सऊदी अरब के लिए मक्का की सुरक्षा केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय नहीं है.

यह उसकी धार्मिक वैधता, राजशाही की पहचान और पूरे मुस्लिम जगत के सामने उसकी जिम्मेदारी से जुड़ा प्रश्न है.

और शायद यही 1979 की सबसे बड़ी विरासत भी है.

उस वर्ष ग्रैंड मस्जिद पर कब्जा करने वाले लोग सत्ता पर कब्जा नहीं कर सके. जुहैमैन को फांसी दे दी गई. विद्रोह समाप्त हो गया. लेकिन उस विद्रोह ने सऊदी राज्य, इस्लामी कट्टरता और मध्य पूर्व की राजनीति को जिस तरह बदल दिया, उसकी गूंज आज भी सुनाई देती है.

मक्का के ऊपर 2026 का ड्रोन कुछ मिनटों में आसमान से गायब हो गया.

लेकिन 1979 की वह स्मृति—जब नमाज के बाद गोलियां चली थीं और दुनिया की सबसे पवित्र मस्जिद करीब दो सप्ताह तक हथियारबंद विद्रोहियों के कब्जे में रही थी—सऊदी अरब की सामूहिक स्मृति से इतनी आसानी से गायब होने वाली नहीं है.

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लेखक के बारे में

By अचल प्रियदर्शी

अचल प्रियदर्शी अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, Geopolitical Analyst, UPSC Educator और 33 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं (जैसे Pratiyogita Darpan) में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. Winning Bengal: Inside West Bengal’s Electoral War of 2026 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  4. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  5. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  6. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  7. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  8. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  9. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  10. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  11. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  12. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

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